भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( ७९ ) त्याज्यं न धैर्य्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्य्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः । याते समुद्रेऽपि हि पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म्म एव ॥ २१६ ॥ दैवके बिगडनेमेभी धीरता त्यागन करनी नहीं चाहिये कारण कि, धैर्यसे कदाचित् स्थितिकी प्राप्ति होजाय समुद्रमे जहाज डूबनेपरभी ' पोत वणिक् उद्यम करनेकीही इच्छा करता है । ( अर्थान्तरन्यासः) ॥ २१६ ॥ तथाच- और देखो- उद्योगिनं सततमत्र समेति लक्ष्मी- दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति । दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः ॥ २१७ ॥ उद्योगी पुरुषको निरन्तर लक्ष्मी मिलती है, प्रारब्ध देता है यह कायर कहते हैं, दैवको त्यागकर आत्मशक्तिसे पुरुषार्थ कर यत्न करनेपरभी यदि सिद्ध न हो तो किसका दोष है ॥ २१७ ॥ तदेवं ज्ञात्वा सुगूढबुद्धिप्रभावेण यथा तौ द्वौ अपि न ज्ञास्यतः तथा मिथो वियोजयिष्यामि । उक्तञ्च- सो ऐसा जानकर अपनी बुद्धिके प्रभाव करके जैसे वह दोनों न जाने इस प्रकार उनको वियुक्त कर दूंगा । कहाभी है- सुगुप्तस्यापि दम्भस्य ब्रह्माप्यन्तं न गच्छति । कौलिको विष्णुरूपेण राजकन्यां निषेवते ॥ २१८ ॥” सम्यक् प्रकारसे छिपाये दम्भके अन्तको तो ब्रह्माभी नहीं जानसकता, इसी लिये एक कौलिक विष्णुके रूपसे राजकन्यासे रमताथा ॥ २१८ ॥” करटक आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्- करटक बोला,-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला-

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