पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८२ ) पञ्चतन्त्रम् । “मित्र ! इन चारोंमें अथवा अन्य सहस्रों उपायोंसेभी मेरा दुःख असाध्य है इस कारण मेरे मरणमें वृथा समयका बिताना मतकरो”। रथकार बोला- “मित्र ! यद्यपि असाध्य है, तथापि निवेदन तो कर जिससे मैंभी उसे असाध्य मानकर तेरे संग अग्निमें प्रवेश करूं क्षणमात्रको. भी तुम्हारा वियोग न सहूंगा यह मेरा निश्चय है”। कौलिक बोला-“मित्र ! जो यह कन्या हथिनीपर चढी उस उत्सवमें देखीथी उसके दर्शन करतेही कामके कारण मेरी यह दशा हुई सो उसकी वेदना अब नहीं सही जाती । जैसा कहा भी है- मत्तेभकुम्भपरिणाहिनि कुंकुमार्द्रे तस्याः पयोधरयुगे रतखेदखिन्नः । वक्षो निधाय भुजपञ्जरमध्यवर्ती स्वप्स्ये कदा क्षणमवाप्य तदीयसंगम् ॥ २२०॥ मत्त हाथियोंके कुम्भकी समान परिणाहवाले केशरसे गीले उसके युगल स्तनोंको रतिके खेदसे खिन्न हुआ मैं भुजाओंके मध्यमें कर हृदयमें रख क्षण मात्रको उसके अंगसंगको प्राप्त होकर कब सोऊंगा ॥ २२० ॥ तथाच- तैसेही- रागी बिम्बाधरोऽसौ स्तनकलशयुगं यौवनारूढगर्व च्छीना नाभिः प्रकृत्या कुटिलकमलकं स्वल्पकञ्चापि मध्यम् । कुर्वन्त्येतानि नाम प्रसभमिह मनश्चिन्तितान्याशु खेदं यन्मां तस्याः कपोलौ दहत इति मुहुः स्वच्छकौ तन्न युक्तम्” लालवर्ण उसका कंदूरीकी समान अधर, कलशकी समान स्तन, गर्वको प्राप्त यौवन, गम्भीर नाभि, स्वभावसेही कुटिल बाल, पतली कमर इतनी वस्तु विचारतेही हठसे मनमें खेद उत्पन्न करतीही हैं और जो उसके स्वच्छ विमल कपोलको मैं वारंवार चिन्तन करताहूं वह जो मुझे जलाते हैं यह युक्त नहीं है ॥ २२१ ॥” रथकारोऽपि एवं सकामं तद्वचनमाकर्ण्यः सस्मितमिद- माह-“वयस्य ! यदि एवं तर्हि दिष्ट्या सिद्धं नः प्रयोज-