भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (८९)

मारें” । तब उसने उस कौलिकको विनयपूर्वक रात्रिमें कहा-“भगवन् ! आपसे जामाता स्थित होनेमें मेरे पिता शत्रुओंसे तिरस्कृत होतेहैं, सो युक्त नहींहै, सो कृपाकर उनको मारो” । कौलिक बोला-“सुभगे ! तुम्हारे पिताके वे शत्रु क्या पदार्थ हैं, सो विश्वास रख क्षणमात्रमें उन सबको सुदर्शनचक्रसे तिलवत् खण्ड खण्ड कर दूंगा” । तब कुछ समय बीतनेपर स्वदेश शत्रुओंने नष्टकर वह राजा परकोट मात्र अवशिष्ट किया ( परकोटमात्र बचा ) तोभी वासुदेवरूपधारी कौलिकको न जानकर वह राजा नित्यही विशेष कपूर अगर कस्तूरी आदि सुगन्धित द्रव्योंसे नानाप्रकार वस्त्र पुष्प भक्ष्य पेय आदि पदार्थ भेजकर कन्याके मुखसे कहलाताभया-“भगवन् ! कल प्रभात काल अवश्यही स्थान भंग होगा, कारण कि, अब घास इन्धन आदिकाभी क्षय हुआहै और सम्पूर्ण जन प्रहारसे जर्जरित देहहुए युद्ध करनेको असमर्थहैं और बहुत मरगये सो यह जानकर इस समय जो उचितहो सोकरो” । यह सुन कौलिकभी विचार करने लगा कि-“स्थानभंग होनेसे अवश्य इसका मेरे साथ वियोग होगा, इसकारण गरुडपर चढ आयुधसहित अपनेको आकाशमे दिखाऊ, कदाचित मुझे वासुदेव जानकर वे डरे हुए राजाके योद्धाओंसे मारे जाय । कहा भी है-

निर्विषेणापि सर्पेण कर्त्तव्या महती फणा । विषं भवतु मा भूयात्फटाटोपो भयंकरः ॥ २२५ ॥

निर्विष सर्पकोभी महाफणा नी चाहिये विष हो या नही फणाटोप भयंकर है ॥ २२५ ॥

अथ यदि मम स्थानार्थमुद्यतस्य मृत्युः भविष्यति तदपि सुन्दरतरम् । उक्तञ्च-

सो यदि मेरी इस स्थानके लिये मृत्यु हो तोभी अच्छा है । कहाहै-

गवामर्थे ब्राह्मणार्थे स्वाम्यर्थे स्त्रीकृतेऽथवा । स्थानार्थे यस्त्यजेत्प्राणांस्तस्य लोकाः सनातनाः ॥२२६।

गो, ब्राह्मण, स्वामी, स्त्री और स्थानके निमित्त जो प्राणोंका त्यागन करतेहैं उनके लिये सनातन लोकहैं ॥ २२६ ॥

चन्द्रे मण्डलसंस्थे विगृह्यते राहुणा दिनाधीशः । शरणागतेन सार्द्धं विपदपि तेजस्विनां श्लाघ्या ॥ २२७॥”