भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( ९२ ) पंचतन्त्रम् ।

-चेष्टा विदित है । सो अब क्या करें” । भगवान् बोले—“आज कौलिक मरणमें निश्चयकर नियमकर युद्धके निमित्त निकला है वह अवश्यही प्रधान क्षत्रियोंके बाण लगनेसे मरजायगा । उसके मरनेमें सब मनुष्य कहेंगे प्रधान क्षत्रियोंने मिलकर वासुदेव और गरुडको मारडाला तब यह लोक हमारी पूजा न करेंगे, तो तू बहुत शीघ्र काठके गरुडमें प्रवेशकर मैंभी कौलिकके शरीरमें प्रवेश करूंगा, जिससे वह शत्रुओंको मारेगा तब शत्रुवधसे हमारा तुम्हारा माहात्म्य बढेगा”। 'बहुत अच्छा' यह गरुडके कहनेपर श्रीभगवान् नारायण उसके शरीरमें प्रवेश करगये । तब भगवान्‌के माहात्म्यसे आकाशमें स्थित हुआ वह शंख, चक्र, गदा, चापके चिन्हसे क्षणमें लीलासेही उन सम्पूर्ण क्षत्रियोंको तेज रहित करताहुआ । तब उस राजाने अपनी सेनासे युक्त संग्राममें वे सब शत्रु जीतकर मारदिये । और सब लोकमें यह चर्चा फैली कि, 'इस राजाने जामाता विष्णुके प्रभावसे सब शत्रु नष्ट करदिये' । कौलिकभी उनको मृतक देख ज्योंही आकाशसे उतरा कि, तबतक राजाके अमात्य और नगरनिवासी लोग उसको कौलिक देखते हुए पूछने लगे यह क्या है ? तब वह आदिसे अपना सब वृत्तान्त कहता भया । तब कौलिकके साहससे प्रसन्न मनहो शत्रुवधसे तेजको प्राप्त हुए राजाने वह राजकन्या सब जनोंके समक्ष विवाहविधिसे उसको समर्पण करदी और देशभी दिया । कौलिकभी उसके साथ पंचोन्द्रियके भोग्य जीवलोकक सार विषय सुखको अनुभव करता समय बिताता हुआ । इसी कारण कहा है कि, “भली प्रकार प्रयोग किया दम्भ” इत्यादि ।

तच्छ्रुत्वा करटक आह-“भद्र ! अस्ति एवम्, परं तथापि महन्मे भयम् । यतो बुद्धिमान् सञ्जीवकः रौद्रश्च सिंहः । यद्यपि ते बुद्धिप्रागल्भ्यं तथापि त्वं पिंगलकात् तं वियोजयितुमसमर्थ एव” । दमनक आह-“भ्रातः ! असमर्थोऽपि सम एव । उक्तञ्च-

यह सुन करटक बोला--“भद्र ! यह तो ऐसेही है तोभी मुझको महाभय है कारण कि, संजीवक बुद्धिमान् और सिंह भयंकर है । यद्यपि तेरी बुद्धि तीव्र है तौभी तू पिंगलकसे उसे वियुक्त करनेको असमर्थ है”। दमनक बोला--“भ्रातः ! असमर्थभी समर्थहूं । कहा है--