भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 536 में से

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भाषाटीकासमेतम् । (९३)

उपायेन हि यत्कुर्यान्न शक्यं पराक्रमैः ।
काक्या कनकसूत्रेण कृष्णसर्पो निपातितः ॥ २२८ ॥”

उपायसे जो होसकता है वह पराक्रमसे नहीं। काकीने सुवर्णसूत्रसे कृष्णसर्पको मारा ॥ २२८ ॥” ॥

करटक आह-“कथमेतत् ?” । सोऽब्रवीत्-
करटक बोला-“यह कैसा ?” वह बोला-

कथा ६.

अस्ति कस्मिंश्चित्प्रदेशे महान् न्यग्रोधपादपः । तत्र वायसदम्पती प्रतिवसतः स्म । अथ तयोः प्रसवकाले वृक्षविवरात् निष्क्रम्य कृष्णसर्पः सदैव तदपत्यानि भक्षयति । ततस्तौ निर्वेदात् अन्यवृक्षमूलनिवासिनं प्रियसहृदं शृगालं गत्वा ऊचतुः-“भद्र ! किमेवंविधे सञ्जाते आवयोः कर्त्तव्यं भवति । एवं तावत् दुष्टात्मा कृष्णसर्पो वृक्षविवरात् निर्गत्य आवयोर्बालकान् भक्षयति । तत् कथ्यतां तद्रक्षार्थं कश्चिदुपायः।

किसी स्थानमें एक वडा वटका वृक्ष है वहां एक कौआ और काकी रहते थे । उसके प्रसव समयमें वृक्षकी खखोडलसे निकलकर काला सर्प सदा उनके सतानको खाजाता । तब वे परम दुःखसे दूसरे वृक्षकी मूलमे रहनेवाले प्रिय सुहृद शृगालके निकट जाकर बोले--“इसप्रकारके कृत्यमें हमको क्या करना चाहिये, इसप्रकारसे वह दुष्टात्मा कृष्णसर्प वृक्षकी खखोडलसे निकल कर हमारे बालक खाजाता है, सो इसकी रक्षाका कोई उपाय कहो ।

यस्य क्षेत्रं नदीतीरे भार्या च परसंगता ।
ससर्पे च गृहे वासः कथं स्यात्तस्य निर्वृतिः ॥ २२९ ॥

जिसका खेत नदीके किनारे है, भार्या परपुरुषगामिनी है, और सर्पयुक्त जिसका निवास है, तिसको सुख कैसा अर्थात् सुख नहीं है ॥ २२९ ॥

अन्यच्च-
औरभी-

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