पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
पृष्ठ 110, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (९५)
दुःखितः सादरमिदमूचे,-“माम ! किमद्य त्वया न आहार-वृत्तिः अनुष्ठीयते ? । केवलमश्रुपूर्णनेत्राभ्यां सनिःश्वासेन स्थीयते” । स आह-“वत्स ! सत्यमुपलक्षितं भवता, मया हि मत्स्यादनं प्रति परमवैराग्यतया साम्प्रतं प्रायोपवेशनं कृतं, तेनाहं समीपगतानपि मत्स्यान् न भक्षयामि” । कुलीरकः तच्छ्रुत्वा प्राह-“माम ! किं तद्वैराग्यकारणम् ?” । स प्राह,-“वत्स ! अहम् अस्मिन् सरसि जातो वृद्धिं गतश्च । तत् मया एतत् श्रुतं यत् द्वादशवार्षिकी अनावृष्टिः सम्पद्यते लग्ना” । कुलीरक आह,-“कस्मात् तच्छ्रुतम् ?” बक आह-“दैवज्ञमुखात् । यतः शनैश्चरो हि रोहिणीशकटं भित्वा भौमं शुक्रञ्च प्रयास्यति ।
किसी वनमें अनेक जलचरोंसे युक्त एक सरोवर है । वहांपर रहनेवाला एक बगला वृद्ध भावको प्राप्त हुआ मछलियोंके खानेको असमर्थ था, वहां भूखसे शुष्ककंठ नदीके किनारे बैठा मोतियोंके समूहकी समान आसुओंके प्रवाहसे पृथ्वीको भिजोता हुआ रोताथा । एक केंकडा अनेक जलचरोंके साथ उसके दुःखसे दुःखी हुआ आदरसे यह बोला,-“मामा ! आज तुम अपने आहारकी वृत्ति क्यों नहीं करते हो?केवल अश्रुपूर्ण नेत्रोंको किये श्वास लेरहे हो”। वह बोला,-“वत्स!आपने सत्य देखा,मैने अब मछलियोके खानेमें परम वैराग्यता होनेसे मरने का व्रत लिया है,इस समयमें समीपमें गई हुई मछलियोको भी नहीं खाताहू”कुलीरक यह सुनकर बोला,-“मामा !तुम्हारेवैराग्यका कारण क्या है ?” वह बोला,-मैं इस सरोवरमें उत्पन्न हुआ और यहीं वृद्धिको प्राप्त हुआहू।सो मैने यह सुना है बारह वर्षकी अनावृष्टि होगी” । कुलीरक बोला-“किससे सुना ?” उस बकने कहा-“ज्योतीषीके मुखसे सुना है कारण कि, शनैश्चर रोहिणीको भेदकरे मंगल शुक्रके निकट प्राप्त होगा ।
उक्तञ्च वराहमिहिरेण- जैसा कि, वराहमिहिरने कहा है-
यदि भिन्ते सूर्य्यपुत्रो रोहिण्याः शकटमिह लोके । द्वादशवर्षाणि तदा न हि वर्षति वासवो भूमौ ॥ २३३ ॥