भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ९९ )

अन्योंको लेजाता है ? सो आज मेरे प्राणोंकी रक्षा कर”। यह सुनकर वहभी दुष्टात्मा विचारने लगा । “मछलियोंके मास खानेसे मेरा जीभी उकता गयाहै, सो आज मैं इस कुलीरकको व्यञ्जनके स्थानमे करूं”। यह विचार उसको पीठपर चढाकर उस वध्यशिलाके उद्देश्य करके चला । कुलीरक भी दूरसे अस्थिपर्वत शिलाआश्रयको देखकर मत्स्योंकी अस्थि पहचानकर उससे पूछने लगा-“मामा ! वह जलाशय कितनी दूर है ? मेरे भारसे तुम अधिक थकगये हो सो कहो।” वहभी मन्दबुद्धि यह जलचर है ऐसा मानकर कि, स्थलमें यह बलवान् न होगा हँसता हुआ यह बोला-“कुलीरक ! दूसरा जलाशय नहीं है, यह मेरी प्राणयात्रा है। सो अब अपने इष्टदेवताका स्मरण करो, तुझेभी इस शिलामें डालकर मैं भक्षण करजाऊंगा”। उसके यह कहने-पर कुलीरकने अपने दोनो दांतोंसे कमलनालकी समान उसकी श्वेत मृदुग्रीवा पकडी जिससे वह मरगया, तब वह उस बगलेकी गरदनको ग्रहणकर सहज सहज उस जलाशयको प्राप्त हुआ, तब सम्पूर्ण जलाशयोंके रहनेवालोंने पूछा “भो कुलीरक ! तू किसप्रकारसे लौट आया ? वह मातुलभी न आया, सो क्यों देर करता है, हम सब बडे उत्कंठित क्षण २ मे वाट देखते स्थितहैं।” उनके ऐसा कहनेपर कुलीरक हँसकर बोला-“मूर्खो ! सम्पूर्ण जलचर उस मिथ्यावादीने ठगकर थोडीही दूर शिलातलपर पटकर खाये । सो मैं आयुशेष होनेसे उस विश्वासघातकका अभिप्राय जानकर यह उसकी गर्दन लेआयाहूं, सो अब उद्वेग मत करो । अब सब जलचरोंकी क्षेम होगी” इससे मैं कहता हूं-“बहुतसे मत्स्योंको खाकर” इत्यादि ।

वायस आह-“भद्र ! तत्कथय कथं स दुष्टसर्पो वधमुपैष्यति ?” । शृगाल आह-“गच्छतु भवान् कञ्चिन्नगरं राजाधिष्ठानम् । तत्र कस्यापि धनिनो राजामात्यादेः प्रमादिनः कनकसूत्रं हारं वा गृहीत्वा तत् कोटरे प्रक्षिप येन । सर्पस्तद्ग्रहणेन वध्यते” । अथ तत्क्षणात् काकः काकी च तदाकर्ण्य आत्मेच्छयोत्पतितौ । ततश्च काकी किञ्चित्सरः प्राप्य यावत्पश्यति तावत् तन्मध्ये कस्यचिद्राज्ञोऽन्तःपुरं जलासन्नं न्यस्तकनकसूत्रं मुक्तमुक्ताहारवस्त्राभरणं जलक्रीडां कुरुते ।