भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( १०० ) पञ्चतन्त्रम् ।

अथ सा वायसी कनकसूत्रमेकमादाय स्वगृहाभिमुखं प्रतस्थे । ततश्च कंचुकिनो वर्षधराश्च तं नीयमानमुपलक्ष्य गृहीतलगुडाः सत्वरमनुययुः । काकी अपि सर्पकोटरे तत् कनकसूत्रं प्रक्षिप्य सुदूरमवस्थिता । अथ यावद्राजपुरुषास्तं वृक्षमारुह्य तत् कोटरमवलोकयन्ति तावत्कृष्णसर्पः प्रसारितभोगस्तिष्ठति । ततस्तं लगुडप्रहारेण हत्वा कनकसूत्रमादाय यथाभिलषितं स्थानं गताः । वायसदम्पती अपि ततः परं सुखेन वसतः। अतोऽहं ब्रवीमि-“उपायेन हि यत् कुर्यात्” इति । तन्न किञ्चिदिह बुद्धिमतामसाध्यमस्ति । उक्तञ्च-

कौआ बोला-“भद्र ! सो कहो किसप्रकारसे वह दुष्ट सर्प वधको प्राप्त होगा?” । शृगाल बोला-“तुम किसी राजाके नगरमें जाओ, वहां किसी धनी राज अमात्यादि किसी असावधानका कनक सूत्र वा हार ग्रहण करके उसकी खखोडलमें डालदो जिससे उसके ग्रहणसेभी वह सर्प वध किया जाय” । तब उसीक्षण वे कोए और कौअन उस वचनको सुन अपनी इच्छासे उडे । सो काकी किसी सरोवरको प्राप्त होकर जबतक देखतीहै तबतक उसके मध्यमें कोई राजाके अन्तःपुरकी स्त्री जलके निकट कनक सूत्र मोती हार तथा वस्त्र रखकर जलक्रीडा करती देखी, तब वह काकी कनकसूत्रको लेकर अपने घरकी ओर चली, तब वे कंचुकी और वर्षधर उसको लेजाता देखकर लकडी ले बहुत शीघ्र उसके पीछे गये, काकी भी सर्पके खखोडलमें उस कनकसूत्रको डाल दूर स्थितहुई । सो जबतक राजपुरुष उस वृक्षमें चढकर उसकी खखोडलको देखते है, तबतक काला सांप फणफैलाये बैठा देखा, तब उसको डंडोके प्रहारसे वधकर कनकसूत्रले अपने अभिलषित स्थानको गये । वायसदम्पतीभी परम सुखसे रहने लगे, इससे मैं कहताहूं “जो उपायसे शक्य है” इत्यादि । सो बुद्धिमानोंको कुछभी असाध्य नहीं है, कहा है-

यस्य बुद्धिर्बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम् । वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥ २३७ ॥”

जिसको बुद्धि है, उसीको बलहै, निर्बुद्धिको बल नहीं । देखो ! वनमें मदोन्मत्त सिंह खरगोशसे मारागया ॥ २३७ ॥”