भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 117

( १०२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

विधि और मन्त्रसे युक्त (अर्थात् सुयुक्ति विधिसे) जोतीहुई कठिन भूमि भी बहुत फलको देतीहै, जैसे अरणी अग्निको मथनेसे देतीहै ॥ २३९ ॥

प्रजानां पालनं शस्यं स्वर्गकोशस्य वर्द्धनम् । पीडनं धर्मनाशाय पापायायशसे स्थितम् ॥ २४० ॥

प्रजापालन राजाओंको प्रशंसनीय है। यही स्वर्गके कोषका बढानाहै। प्रजाको पीडा देना धर्मके नाश, पाप और अकीर्तिके लिये होताहै ॥ २४० ॥

गोपालेन प्रजाधेनोर्वित्तदुग्धं शनैः शनैः । पालनात्पोषणाद्ग्राह्यं न्याय्यां वृत्तिं समाचरेत् ॥ २४१ ॥

गोपालको प्रजारूपी गौका दूध शनैः २ ग्रहण करना चाहिये, पालन पोषण और न्यायकी वृत्तिसे ग्रहणकरै ॥ २४१ ॥

अजामिव प्रजां मोहाद्यो हन्यात्पृथिवीपतिः । तस्यैका जायते तृप्तिर्न द्वितीया कथञ्चन ॥ २४२ ॥

और जो राजा मोहसे बकरी समान प्रजाको नष्टकरताहै, उस एककीही तृप्ति होती है, दूसरेकी कदाचित् नहीं ॥ २४२ ॥

फलार्थी नृपतिर्लोकान्पालयेद्यतमास्थितः । दानमानादितोयेन मालाकारोऽङ्कुरानिव ॥ २४३ ॥

फलकी इच्छावाला राजा यत्नसे लोकोको पालनकरे जिसप्रकार दान मानके जलसे माली अंकुरोंको बढाताहै ॥ २४३ ॥

नृपदीपो धनस्नेहं प्रजाभ्यः संहरन्नपि । आन्तरस्थैर्गुणैः शुभ्रैर्लक्ष्यते नैव केनचित् ॥ २४४ ॥

दीपककी समान राजा प्रजासे धनरूपी स्नेहको ग्रहण करता हुआ अपने अन्तरमे स्थित श्रेष्ठ गुणोंके कारण किसीको लक्षित नहीं होताहै ॥ २४४ ॥

यथा गौर्दुह्यते काले पाल्यते च तथा प्रजाः । सिच्यते चीयते चैव लता पुष्पफलप्रदा ॥ २४५ ॥

जैसे समयपर गौ दुही जातीहै ऐसेही पालीहुई प्रजा समयपर दुही जातीहै सींचीहुई लताही समयपर पुष्प फलादि प्रदान करतीहै ॥ २४५ ॥

यथा बीजङ्कुरः सूक्ष्मः प्रयत्नेनाभिरक्षितः । फलप्रदो भवेत्काले तद्वल्लोकः सुरक्षितः ॥ २४६ ॥