भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( १०९ )

ध्यगतं दृष्ट्वा सिंहनादं मुमोच । ततः प्रतिशब्देन कूपमध्याद्द्विगुणतरो नादः समुत्थितः। अथ तेन तं शत्रुं मत्वा आत्मानं तस्य उपरि प्रक्षिप्य प्राणाः परित्यक्ताः । शशकोऽपि हृष्टमनाः सर्वमृगान् आनन्द्य तैः सह प्रशस्यमानो यथासुखं तत्र वने निवसति स्म। अतोऽहं ब्रवीमि--“यस्य बुद्धिर्बलं तस्य” इति ।

भासुरक बोला,-“भो ! तुझे इस बातसे क्या उस किलेमे स्थितभी उसे मुझे दिखा” । तब शशक बोला,-“जो ऐसा है तो आओ स्वामी ” यह कहकर आगे चला । तब उसने आतेमें जो कूप देखा था उसी कूपको प्राप्त होकर वह भासुरकसे बोला,-“स्वामिन् ! आपका प्रताप कौन सह सकताहै । तुमको देखकर दूरसेही वह चोर सिंह अपने दुर्गमें प्रविष्ट हुआ है सो आओ मैं दिखाऊ” भासुरक बोला,-“मुझे वह दुर्ग दिखाओ” तब इसने वह कूप दिखलाया। तब वहभी मूर्ख सिंह अपने प्रतिबिम्बको कूपमें स्थित देख सिंहनाद करता भया उसकी प्रतिध्वनिसे कुएसे दूना नाद उठा । उससे वह उसको शत्रु मानकर अपनेको उसके ऊपर डालकर प्राण छोडता भया । खरगोशभी प्रसन्न मनहो सब मृगोको आनंदित कर उनके साथ प्रशंसितहो यथासुखसे उस वनमे रहने लगा। इससे मैं कहताहू “जिसको बुद्धि है उसको बल है ।”

तद्यदि भवान् कथयति, तत्तत्रैव गत्वा तयोः स्वबुद्धिप्रभावेण मैत्रीभेदं करोमि”। करटक आह--“भद्र ! यदि एवं तर्हि गच्छ, शिवास्ते पन्थानः सन्तु, यथाभिप्रेतमनुष्ठीयताम्” । अथ दमनकः सञ्जीवकवियुक्तं पिंगलकमवलोक्य तत्रान्तरे प्रणम्याग्रे समुपविष्टः । पिंगलकोऽपि तमाह--“भद्र ! किं चिरात् दृष्टः?” दमनक आह--“ न किञ्चिद्देवपादानामस्माभिः प्रयोजनम्, तेन अहं नागच्छामि। तथापि राजप्रयोजनविनाशमवलोक्य सन्दह्यमानहृदयो व्याकुलतया स्वयमेव अभ्यागतो वक्तुम् । उक्तञ्च-

सो यदि आप कहें तो वहा जाकर उनका अपनी बुद्धिके प्रभावसे मैत्रीभेद करूं” । करटक बोला,-“भद्र ! जो ऐसा है तो जाओ, तुम्हारे मार्ग