भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( ११० ) पञ्चतन्त्रम् ।

मंगलकारीहों, अभिलषित अनुष्ठान करो”। तब दमनक संजीवकसे अलग पिंगलकको देखकर उसी समय प्रणामकर आगे बैठा, पिंगलक उससे बोला,—“भद्र ! बहुत दिनोंमें क्यों दिखे ?” दमनक बोला,—“श्रीमान्‌के चरणोंका हमसे कुछभी प्रयोजन नहीं है, इससे मैं नहीं आताहूं । तथापि राजप्रयोजनका नाश देखकर संदिग्ध हृदय हो व्याकुलतासे स्वयं ही कहनेको आयाहूं। कहा है—

प्रियं वा यदि वा द्वेष्यं शुभं वा यदि वाशुभम् । अपृष्टोऽपि हितं वक्ष्येद्यस्य नेच्छेत्पराभवम् ॥ २६२ ॥ ”

प्यारा वा द्वेषी शुभ या अशुभ बिना पूछे हितू उससे कहै जिसके पराभवकी इच्छा न हो ॥ २६२ ॥”

अथ तस्य साभिप्रायं वचनमाकर्ण्य पिंगलक आह—“किं वक्तुमना भवान् ? तत्कथ्यतां यत्कथनीयमस्ति” स प्राह—“देव ! सञ्जीवको युष्मत्पादानामुपरि द्रोहबुद्धिरिति विश्वासगतस्य मम विजने इदमाह—“भो दमनक ! दृष्टा मया अस्य पिंगलकस्य सारासारता तदहमेनं हत्वा सकलमृगाधिपत्यं त्वत्सांचिव्यपदवीसमान्वितं करिष्यामि” इति। पिंगलकोऽपि तद्वज्रसारप्रहारसदृशं दारुणं वचः समाकर्ण्य मोहमुपगतो न किञ्चिदपि उक्तवान् दमनकोऽपि तस्य तमाकारमालोक्य चिन्तितवान् । “अयं तावत्सञ्जीवकनिबद्धरागः तन्नूनमनेन मन्त्रिणा राजा विनाशमवाप्स्यतीति । उक्तञ्च—

तब उसके अभिप्राय सहित वचनोंको सुनकर पिंगलक बोला,—“तुम क्या कहना चाहते हो, सो जो कथनीय हो सो कहो”। वह बोला,—“देव ! संजीवक आपके चरणोंमें द्रोहबुद्धि रखता है, यह उसने मेरेकूं विश्वाससे एकान्तमें कहा है—“भो दमनक ! मैने इस पिंगलक राजाकी सारासारता देखी सो मै इसको मारकर सब मृगोंका आधिपत्य तुझे मंत्रीपद देकर करूंगा ”। पिंगलकभी वह वज्रसारके प्रहारकी समान दारुण वचनको सुनकर मोहको प्राप्त होकर कुछभी न कहता भया, दमनक उसके आकारको देख विचारने लगा। “यह तो संजीवकमें अनुरागी है, सो अवश्य इस मंत्रीसे राजा नाशको प्राप्त होगा। कहाभी है—