भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (११३)

इतः स दैत्यः प्राप्तश्रीनैत एवार्हति क्षयम् ।
विषवृक्षोऽपि संवर्द्धर्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतम् ॥ २६८ ॥

( तारकासुरसे पीडित उसके वधार्थी देवताओं प्रति ब्रह्माका वचन है ) कि, वह दैत्य मुझसे ऐश्वर्य प्राप्त कर चुका है वधके योग्य नहीं है कारण कि, स्वय बढ़ाया हुआ विषवृक्षभी ( आप ) नहीं काटाजाता ॥ २६८ ॥

आदौ न वा प्रणयिनां प्रणयो विधेयो
दत्तोऽथवा प्रतिदिनं परिपोषणीयः ।
उत्क्षिप्य यत्क्षिपति तत्प्रकरोति लज्जां
भूमौ स्थितस्य पतनाद्भयमेव नास्ति ॥ २६९ ॥

प्रथम तो प्रणयिजनोंको प्रणय ( प्रेम ) नहीं करना चाहिये और करे तो फिर प्रतिदिन उसका पालन करे जो करके छोड़ा जाता है वह लज्जा करताहै कारण कि, पृथ्वीमे स्थितको गिरनेका भय नहीं है ॥ २६९ ॥

उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः ।
अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते ॥ २७० ॥

जो उपकारियोंका भला करता है उसके उपकारीपनमें क्या गुणहै जो अपकारियोंमें साधु है सत्पुरुषोने उसीको साधु कहा है ॥ २७० ॥

तद्द्रोहबुद्धेरपि मया अस्य न विरुद्धमाचरणीयम्" । दमनक आह-"स्वामिन् ! नैष राजधर्मो यद्द्रोहबुद्धेरपि क्षम्यते । उक्तञ्च-

सो इस द्रोहबुद्धिपरभी मैं विरुद्ध आचरण नहीं करूंगा"। दमनक बोला,- "स्वामिन् ! यह राजधर्म नहीं है कि, द्रोहबुद्धिको क्षमा किया जाय। कहाभी है-

तुल्यार्थं तुल्यसामर्थ्यं मर्मज्ञं व्यवसायिनम् ।
अर्द्धराज्यहरं भृत्यं यो न हन्यात्स हन्यते ॥ २७१ ॥

तुल्यधन, तुल्य सामर्थ्य, मर्म जाननेवाले उद्योगी अर्धराज हरनेवाले भृत्यको जो नहीं मारताहै वह मारा जाता है ॥ २७१ ॥

अपरं त्वया अस्य सखित्वात् सर्वोऽपि राजधर्मः परित्यक्तो राजधर्माभावात सर्वोऽपि परिजनो विरक्तिं गतो यः