भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 129

( ११४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सञ्जीवकः शष्पभोजी, भवान् मांसादः तव प्रकृतयश्च । यत्तव अवध्यव्यवसायबाह्यं कुतस्तासां मांसाशनम् । यद्रहितास्ताः त्वां त्यक्त्वा यास्यन्ति । ततोऽपि त्वं विनष्ट एव अस्य सङ्गत्या पुनस्ते न कदाचित् आखेटके मतिर्भविष्यति । उक्तञ्च-

और आपने तो इसकी मित्रतासे सम्पूर्ण ही राजधर्म त्यागन करदियाहै । राजधर्मके अभावसे सम्पूर्ण परिजन विरक्त होकर गये, जो यह संजीवक तृणभोजी आप मांसभक्षी और आपके प्रकृति ( कुटुम्ब ) भी, जो कि अब मांस भक्षण तुम्हारे पराक्रमसे बाह्य होगयाँ ( तुम उद्योग नहीं करतेहो ) तो फिर वह मांस कहासे खायेंगे इसकारण वे तुमको त्यागन कर चलेजावेंगे । इसीसे तुम विनष्ट होंगे । इसकी संगतिस तुम्हारी आखेटमें कभी बुद्धि नहीं होगी । कहाहै-

यादृशः सेव्यते भृत्यैर्यादृशांश्चोपसेवते ।
कदाचिन्नात्र सन्देहस्तादृग्भवति पूरुषः ॥ २७२ ॥

जब जो जैसे भृत्योंसे सेवन किया जाता है वा जो जैसोंको सेवन करता है इसमें सन्देह नहीं वह पुरुष वैसाही होजाताहै ॥ २७२ ॥

तथाच-
तैसेही-

सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते
मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते ।
स्वातौ सागरशुक्तिकुक्षिपतितं तज्जायते मौक्तिकं
प्रायेणाधममध्यमोत्तमगुणः संवासतो जायते ॥ २७३ ॥

तपेहुए लोहेपर पडेहुएँ जलका नाममात्रभी नहीं विदित होता है और वही कमलपत्रके ऊपर मोतीके आकारमें स्थितहुआ शोभा पाता है, स्वातिनक्षत्रमें सागरमें सीपीमें प्रवेशकर वही मोती होजाता है, प्रायः संगतिसे अधम, मध्यम, उत्तम गुण होजाते हैं ॥ २७३ ॥

तथाच-
और देखो-