पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा ।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम् ॥ २८० ॥
उपदेशसेही कोई किसीका स्वभाव अन्यथा नहीं कर सकता है तपाया हुआभी पानी फिर शीतल होजाता है ॥ २८० ॥
यदि स्याच्छीतलो वह्निः शीतांशुर्दहनात्मकः ।
न स्वभावोऽत्र मर्त्यानां शक्यते कर्तुमन्यथा ॥ २८१ ॥
चाहैं अग्नि शीतल होजाय, चन्द्रमा जलाने लगे, तथापि मनुष्योका स्वभाव कोई अन्यथा नहीं कर सकता है ॥ २८१ ॥
अथ असौ महीपतिः सूच्यग्रविद्ध इव तच्छयनं त्यक्त्वा तत्क्षणादेव उत्थितः । "अहो ! ज्ञायतामत्र प्रच्छादनपटे मत्कुणो यूका वा नूनं तिष्ठति येन अहं दष्ट इति" । अथ ये कञ्चुकिनस्तत्र स्थितास्ते सत्वरं प्रच्छादनपटं गृहीत्वा सूक्ष्मदृष्ट्या वीक्षांचक्रुः । अत्रान्तरे स मत्कुणः चापल्यात् खट्टान्तं प्रविष्टः सा मन्दविसर्पिणी अपि वस्त्रसन्ध्यन्तर्गता तैर्दृष्टा व्यापादिता च, अतोऽहं ब्रवीमि, "न ह्यविज्ञातशीलस्य" इति । एवं ज्ञात्वा त्वया एष वध्यः । नो चेत् त्वां व्यापादयिष्यति । उक्तञ्च-
तब यह राजा सूचीके अग्र भागकी समान विद्ध हुआ खाट छोडकर उसी समय उठबैठा । "अहो ! देखो तो इस चादरमें खटमल वा लीं जू अवश्य है जिसने मुझे काट लिया" । तब जो कंचुकी वहां स्थित थे वह बहुत शीघ्र चादरको ले सूक्ष्म दृष्टिसे देखने लगे । इसी समय वह खटमल चपलतासे खाटके नीचे गया और मन्दविसर्पिणी वस्त्रकी सलवटमें बैठी हुई उन्होने देखी और मारडाली, इससे मैं कहता हूं "जिसका शील स्वभाव न देखा हो उसे न टिकावे" । ऐसा जानकर तुम्हें इसको मारना ही उचित है, नहीं तो यह आपको मार डालेगा । कहा है-
त्यक्ताश्चाभ्यन्तरा येन बाह्याश्चाभ्यन्तरीकृताः ।
स एव मृत्युमाप्नोति यथा राजा ककुद्द्रुमः ॥ २८२ ॥”