भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

( १२६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

जो शत्रुको अन्य उपायोंसे नहीं मारसके तो अपनी कन्या देकर भी मारे क्योकि, उसके मारनेमें दोष नहीं अर्थात् किसी प्रकारसेभी शत्रु का मारना दोषकारक नहीं है ॥ २९९ ॥

कृत्याकृत्यं न मन्येत क्षत्रियो युधि सङ्गतः ।
प्रसुप्तो द्रोणपुत्रेण धृष्टद्युम्नः पुरा हतः ॥ ३०० ॥”

युद्ध करनेको तैयार हुवा शूरवीर युद्धमें कर्तव्य और अकर्तव्यका विचार न करे सोही कहते हैं कि, देखो पूर्वकालमें द्रोणाचार्यके पुत्र अश्वत्थामाने सोता-हुआ भी धृष्टद्युम्न मारडाला ॥ ३०० ॥”

तदहं तस्य निश्चयं ज्ञात्वा त्वत्सकाशमिहागतः । साम्प्रतं मे नास्ति विश्वासघातकदोषः । मया सुगुप्तमन्त्रस्तव निवेदितः । अथ यत् ते प्रतिभाति तत्कुरुष्व” इति । अथ सञ्जीवकस्तस्य तद्वज्रपातदारुणं वचनं श्रुत्वा मोहमुपागतः । अथ चेतनां लब्ध्वा सवैराग्यमिदमाह—“भो ! साधु चेदमुच्यते–

इसलिये मैं उसका निश्चय करके तुम्हारे समीप आया हूं । अब मेरेको विश्वास घातका कोई दोष नहीं । यह गुप्त सलाह मैंने तुम्हारे अगाडी निवेदन करदीहै । इसके अनन्तर तुमको जो श्रेष्ठ प्रतीत होवै सो करो” । पश्चात् संजीवक वज्र पातसरीखा तिसका वह वचन सुनकर मोहको प्राप्त होगया । इसके अनन्तर संजीवक बुद्धिको प्राप्त होकर वैराग्यसे यह वचन कहने लगा कि,–“भो ! यह यथार्थ कहाहै–

दुर्जनगम्या नार्यः प्रायेणास्नेहवान्भवति राजा ।
कृपणानुसारि च धनं मेघो गिरिदुर्गवर्षी च ॥ ३०१ ॥

नारी प्रायःकरके दुर्जनगम्यहैं अर्थात् अपने दुर्जनोंसे भी मिलसकतीहैं और राजा स्नेह रहित होताहै, धन कृपणके पासही रहता है और मेघ प्रायः करके पर्वत और दुर्गपर बरसते हैं ॥ ३०१ ॥

अहं हि सम्मतो राज्ञो य एवं मन्यते कुधीः ।
बलीवर्दः स विज्ञेयो विषाणपरिवर्जितः ॥ ३०२ ॥

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित) · पृष्ठ 141, कुल 536 में से · BharatKosha