भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( १३४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

अवस्था वर्त्तते, तत् किं पर्यटितेन तेन विना कोऽत्र अस्मान् रक्षिष्यति । तद्गत्वा तस्य क्षुद्रोगात् परलोकं प्रस्थितस्य आत्मशरीरदानं कुर्मो येन स्वामिप्रसादस्य अनृणतां गच्छामः । उक्तञ्च-

यह सुनकर मदोत्कट बोला,-"जा ऐसा है तो जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो"। यह सुनकर वह उनके पास जाकर बोला,-"भो ! भो ! स्वामीकी बडी कठिन अवस्था है सो अब फिरनेसे क्या स्वामीके विना हमारी कौन रक्षा करेगा, सो चलकर क्षुधारोगसे परलोक जाते हुए उसको अपना शरीर प्रदान करें जिससे स्वामीके प्रसादसे अनृणताको प्राप्त होजायें, कहा है-

आपदं प्राप्नुयात्स्वामी यस्य भृत्यस्य पश्यतः । प्राणेषु विद्यमानेषु स भृत्यो नरकं व्रजेत् ॥ ३१५ ॥"

जिस भृत्यके देखते स्वामी आपत्तिको प्राप्त होता हो अपने प्राण होते उसकी रक्षा न करे वह भृत्य नरकको जाता है ॥ ३१५ ॥"

तदनन्तरं ते सर्वे बाष्पपूरितदृशो मदोत्कटं प्रणम्य उपविष्टाः । तान् दृष्ट्वा मदोत्कट आह-"भोः ! प्राप्तं दृष्टं वा किञ्चित् सत्त्वम् ?" अथ तेषां मध्यात् काकः प्रोवाच,-"स्वामिन् ! वयं तावत् सर्वत्र पर्यटिताः, परं न किञ्चित्सत्त्वमासादितं दृष्टं वा । तदद्य मां भक्षयित्वा प्राणान् धारयतु स्वामी, येन देवस्य आश्वासनं भवति मम पुनः स्वर्गप्राप्तिरिति । उक्तञ्च-

तब वे सब आंखोंमें आंसू भरे मदोत्कटको प्रणाम कर बैठे । उनको देखकर मदोत्कट बोला,-"भो ! कोई जीव प्राप्त हुआ या देखा?"। तब उनके बीचमेंसे कौआ बोला,-"स्वामिन् ! हम सब स्थानमें घूमे परन्तु न कोई जीव पाया न देखा । सो आज मुझे भक्षण कर स्वामी अपने प्राणोंको धारण करे जिससे स्वामीका आश्वासन और मेरी स्वर्गप्राप्ति होगी, कहा है-

स्वाम्यर्थे यस्त्यजेत्प्राणान्भृत्यो भक्तिसमन्वितः । परं स पदमाप्नोति जरामरणवर्जितम् ॥ ३१६ ॥"

भक्तिमान् जो सेवक स्वामीके निमित्त प्राण त्यागना करता है वह जरामरण रहित परमपदको प्राप्त होता है ॥ ३१६ ॥