भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। ( १४९ )

अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं
सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः
कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विनश्यति ॥ ३५२ ॥

अरक्षित पुरुष दैवसे रक्षित हुआ स्थित रहताहै दैवसे हत होनेसे सुरक्षितभी नष्ट होता है । वनमें त्यागन किया अनाथभी जीताहै और यत्नकरने पर घरमें भी नहीं जीता है ॥ ३५२ ॥

तदहं न यास्यामि भवद्भां च यत्प्रतिभाति तत्कर्त्तव्यम्" । अथ तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा अनागतविधाता प्रत्युत्पन्नमतिश्च निष्क्रान्तौ सह परिजनेन । अथ प्रभाते तैर्मत्स्यजीविभिर्जालैस्तज्जलाशयमालोड्य यद्भविष्येण सह तत् सरो निर्मत्स्यतां नीतम् । अतोऽहं ब्रवीमि "अनागताविधाता च" इति तत् ज्ञात्वा टिट्टिभ आह-"भद्रे ? किं मां यद्भविष्यसदृशं सम्भावयसि ? तत्पश्य मे बुद्धिप्रभावं यावदेनं दुष्टसमुद्रं स्वचञ्च्वा शोषयामि" । टिट्टिभी आह- "अहो ! कस्ते समुद्रेण सह विग्रहः ? तन्न युक्तमस्योपरि कोपं कर्तुम् । उक्तञ्च-

तो मैं तो और स्थानमें न जाऊंगा जो आपको अच्छा लगे सो करो" । तब उसके इस निश्चयको जानकर अनागतविधाता और प्रत्युत्पन्नमति परिजन ( कुटुम्ब ) सहित वहांसे चलेगये । प्रातःकाल धीमरोंने जालसे उस सरोवरको आलोड़ित कर यद्भविष्यके संग वह सरोवर मत्स्यरहित करदिया । इससे मैं कहता हूं "अनागतविधाता प्रत्युत्पन्नमति"। यह सुन टिट्टिभ बोला,-"भद्रे! क्या तू मुझे यद्भविष्यकी समान जानती है ? तो मेरी बुद्धिके प्रभावको देख कि, इस दुष्ट समुद्रको अपनी चोंचसे शोखे डालता हूँ" । टिट्टिभी बोली,-"अहो ! समुद्रसे तुम्हारी कैसी लड़ाई ? सो इसके ऊपर क्रोध करना उचित नहीं । कहाहै-

पुंसामसमर्थानामुपद्रवायात्मनो भवेत्कोपः ।
पिठरं ज्वलदतिमात्रं निजपार्श्वानिव दहतितराम् ॥३५३॥