भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( १६० ) पञ्चतन्त्रम् ।

असमर्थ पुरुषोंका क्रोध अपने नाशके ही निमित्त होताहै अत्यन्त जलती हुई कसेरी अपने निकटकोही जलातीहै ॥ ३५३ ॥

तथाच-
और देखो-

अविदित्वात्मनः शक्तिं परस्य च समुत्सुकः ।
गच्छन्नभिमुखो नाशं याति वह्नौ पतंगवत् ॥ ३५४ ॥”

जो उत्कंठित हो अपनी शक्ति और परकी शक्ति विनाजाने सन्मुख जाताहै वह अग्निमें पतंगकी समान नष्ट होजाताहै ॥ ३५४ ॥”

टिट्टिभ आह-“प्रिये ! मामैवं वद् येषामुत्साहशक्तिः भवति ते स्वल्पा अपि गुरून् विक्रमन्ते । उक्तञ्च-

टिट्टिभ बोला,—'प्रिये ! ऐसा मत कहो जिनको उत्साहशक्ति होतीहै वे स्वल्पभी बडे बडोंपर आक्रमण करते हैं। कहाहै-

विशेषात्परिपूर्णस्य याति शत्रोरमर्षणः ।
आभिमुख्यं शशाङ्कस्य यथाद्यापि विधुन्तुदः ॥ ३५५ ॥

क्रोधी शत्रु विशेषकर परिपूर्णकेही सन्मुख जातेहैं जैसे राहु अर्थात् चन्द्रमाके सन्मुख ॥ ३५५ ॥

तथाच-
औरभी देखो-

प्रमाणादधिकस्यापि गण्डश्याममदच्युतेः ।
पदं मूर्ध्नि समाधत्ते केसरी मत्तदन्तिनः ॥ ३५६ ॥

प्रमाणसेभी अधिक, गण्डस्थलमें श्याम, मदत्यागनेवाले मत्त हाथीके सिरपर सिंह चरण रखता है ॥ ३५६ ॥

तथाच-
तैसेही-

बालस्यापि रखेः पादाः पतन्त्युपरि भूभृताम् ।
तेजसा सहजातानां वयः कुत्रोपयुज्यते ॥ ३५७ ॥

बालक सूर्यकी किरणों पर्व्वतोंके ऊपर गिरती है तेजके साथ उत्पन्न हुओंकी अवस्था नहीं देखीजातीहै ॥ ३५७ ॥