पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १५१ )
हस्ती स्थूलतरः स चाङ्कुशवशः किं हस्तिमात्रोऽङ्कुशः दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः किं दीपमानं तमः । वज्रेणापि शताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रो गिरि- स्तेजो यस्य विराजते स बलवान्स्थूलेषु कः प्रत्ययः ३५८
हाथी महास्थूलहै वह अंकुशके वशमेंहै क्या अंकुश हाथीकी समान है ? दीपकके ज्वलित होनेमें अंधकार नाश होताहै क्या दीपक अंधकारकी समान है ? वज्रसे सैकड़ों पर्वत गिरजाते हैं क्या वज्र पर्वतकी समान है ? तेज जिसमे है वही बलवान् है मोटे शरीरवालोंमें क्या विश्वास है ॥ ३५८ ॥
तदनया चञ्च्वास्य सकलं तोयं शुष्कस्थलतां नयामि” । टिट्टिभी आह-“भोः कान्त ! यत्र जाह्नवी नवनदीशतार्नि गृहीत्वा नित्यमेव प्रविशति तथा सिन्धुश्च, तत्कथं त्वमष्टादशनदीशतैः पूर्य्यमाणं तं विप्लुषवाहिन्या चञ्च्वा शोषयिष्यसि ? । तत् किमश्रद्धेयेन उक्तेन” । टिट्टिभ आह-“प्रिये !
सो इस चोंचसे इसका सम्पूर्ण जल सुखा डालूंगा" टिट्टिभी बोली,-“भो स्वामिन् ! जहा गंगा नदी नौसौ नदियोंको लेकर नित्यही प्रवेश करती है तथा सिन्धु नदभी, सो किस प्रकार तू अठारहसा नदियोसे पूर्यमाण उस सागरको जलकण वहन करनेवाली चोंचसे सुखासकेगा ? सो अश्रद्धेय वचनोंसे क्या लाभ है" टिट्टिभ बोला,-"प्रिये !
अनिर्वेदः श्रियो मूलं चञ्चुर्मे लोहसन्निभा । अहोरात्राणि दीर्घाणि समुद्रः किं न शुष्यति ॥ ३५० ॥
निर्वेदका नहोना उद्योग) लक्ष्मीका मूल है मेरी चोंच लोहनिर्मितसी है दिन रात दीर्घहै समुद्र क्यों न सूखेगा ॥ ३५९ ॥
दुराधिगमः परभागो यावत्पुरुषेण पौरुषं न कृतम् । जयति तुलामधिरूढो भास्वानपि जलदपटलानि॥३६०॥
परायाभाग कठिनतासे मिलताहै, परन्तु तभीतक, जबतक कि,- पुरुष पुरुषार्थ नहीं करताहै तुला (सक्रमण)में प्राप्त हुआ सूर्यभी मेघसमूहको जीतताहै ३६०॥”
टिट्टिभ्याह-“यदि त्वयावश्यं समुद्रेण सह वैरात्नुष्ठानं कार्य्यं तदन्यानपि विहंगानाहूय सुहृज्जनसहित एवं समाचर । उक्तञ्च-