पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। ( १५३ )
हाथी तमालवृक्षके नीचे धूपसे घबडाया छायाकी इच्छासे आबैठा, मदके उत्कर्षसे उस वृक्षकी उस शाखाको जिसपर चटक था अपनी सूंडके अग्रभागसे खेंचकर तोड डाला, उसके टूटनेसे चटकके सम्पूर्ण अण्डे भग्न होगये आयु शेष रहनेसे किसी प्रकार चटका चटकी प्राणोसे वियुक्त न हुए । तब चटका निज अंडोंके भंग होनेसे तिरस्कृत हो रुदन करती कुछभी सुखको प्राप्त न हुई उसी समय इसके इस प्रलापको सुन खुटबढई नामकपक्षी उसका परमसुहृत् उसके दुःखसे दुःखी हुआ आकर उससे बोला—“भगवति ! क्यो वृथा रुदन करती हो । कहाहै—
नष्टं मृतमतिक्रान्तं नानुशोचन्ति पण्डिताः । पण्डितानाञ्च मूर्खाणां विशेषोऽयं यतः स्मृतः ॥ ३६३ ॥
नष्ट, मृत और विशीर्ण हुएका पडितजन सोच नहीं करते हैं यही पडित और मूर्खोमें विशेषहै ॥ ३६३ ॥
तथाच— तैसेही—
अशोच्यानीह भूतानि यो मूढस्तानि शोचति । स दुःखे लभते दुःखं द्वावनर्थों निषेवते ॥ ३६४ ॥
इस संसारमें जो मूढ अशोच्योंको शोच करताहै वह दुःखमें दुःख दोनों अनर्थोंको सेवन करताहै ॥ ३६४ ॥
अन्यच्च— औरभी—
श्लेष्माश्चु बान्धवैर्मुक्तं प्रेतो भुंक्ते यतोऽवशः। तस्मान्न रोदितव्यं हि क्रियाः कार्याश्च शक्तितः॥३६५॥”
बांधवोंके त्यागन किये श्लेष्माश्चु आसुओको प्रेत अवशहोकर भोगताहै इस कारण रोना उचित नहीं शक्तिके अनुसार उसकी क्रियाकरै ॥ ३६५ ॥”
चटका प्राह—“अस्त्वेतत् । परं दुष्टगजेन मदात् मम सन्तानक्षयः कृतः, तद्यदि मम त्वं सुहृत् सत्यस्तदस्य गजापसदस्य कोऽपि वधोपायश्चिन्त्यतां यस्य अनुष्ठानेन मे सन्ततिनाशदुःखमपसरति । उक्तञ्च—