भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

( १९४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

चटकान कहा,-“यह सत्यहै परन्तु दुष्ट हाथीने मदसे मेरी सन्तान क्षय करडाली सो यदि तुम मेरे सत्य सुहृद् हो तो इस नीच हाथीका कोई वधोपाय चिन्तन करो जिसके करनेसे मेरी सन्ताननाशका दुःख दूरहो । कहाहै-

आपदि येनापकृतं येन च हसितं दशासु विषमासु । अपकृत्य तयोरुभयोः पुनरपि जातं नरं मन्ये ॥ ३६६ ॥”

जिसने आपत्तिमें बुरा किया, दुःखदशामें जिसने हास्य किया उन दोनोंका अपकार करके मैं मनुष्यका फिर जन्म होना मानता हूं ॥ ३६६ ॥”

काष्ठकूट आह-“भगवति ! सत्यमभिहितं भवत्या। उक्तंच- खुटबढई बोला-“भगवति ! तुमने सत्य कहा । कहा भी है-

स सुहृद्व्यसने यः स्यादन्यजात्युद्भवोऽपि सन् । वृद्धौ सर्वोऽपि मित्रं स्यात्सर्वेषामेव देहिनाम् ॥ ३६७ ॥

चाहे अन्य जातिका है पर दुःखमें जो सहाय करे वही सुहृद् है वृद्धिमें सब देहधारियोंके सब मित्र होते हैं ॥ ३६७ ॥

स सुहृद्व्यसने यः स्यात्स पुत्रो यस्तु भक्तिमान् । स भृत्यो यो विधेयज्ञः सा भार्या यत्र निर्वृतिः ॥३६८॥

वही सुहृद् है जो दुःखमें साथ दे, वही पुत्र है जो भक्तिमान् है, वही भृत्य है जो विधिका जाननेवाला है और वही भार्या है जिससे सुख हो ॥ ३६८ ॥

तत्पश्य मे बुद्धिप्रभावं, परं ममापि सुहृद्भूता वीणारवा नाम मक्षिका अस्ति । तत् तामाहूय आगच्छामि येन स दुरात्मा दुष्टगजो वध्यते'। अथ असौ चटकया सह मक्षिकामासाद्य प्रोवाच-“भद्रे ! मम इष्टा इयं चटका केनचिद् दुष्टगजेन पराभूता अण्डस्फोटनेन तत्तस्य वधोपायमनुतिष्ठतो मे साहाय्यं कर्तुमर्हसि”। मक्षिकापि आह-“भद्र ! किमुच्यतेऽत्र विषये । उक्तञ्च-

सो मेरी बुद्धिके प्रभावको देखो, परन्तु मेरी एक मित्रभूत वीणारवा नामक मक्खी है उसको बुलाकर आता हूं जिससे वह दुरात्मा दुष्ट हाथी मरे”। तब यह चटकाके सहित मक्षिकाको प्राप्त होकर बोला,-“भद्रे ! मेरी सुहृद् यह चटका किसी दुष्ट हाथीने अण्डे नष्ट कर तिरस्कृत की है। सो इसके वधोपायका अनु-