पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२) पञ्चतन्त्रम् ।
सकलार्थशास्त्रसारं जगति समालोक्य विष्णुशर्मेदम् । तन्त्रैः पञ्चभिरेतच्चकार सुमनोहरं शास्त्रम् ॥ ३ ॥
इस प्रकार विष्णुशर्माने इस जगत्में सम्पूर्ण अर्थशास्त्रका सार देखकर पंच-तंत्रोंमे यह मनोहर शास्त्र निर्माण किया है ॥ ३ ॥
तद्यथा अनुश्रूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम् । तत्र सकलार्थिकल्पद्रुमः प्रवरमुकुटमणिमरीचिमञ्जरीचर्चितचरणयुगलः सकलकलापारंगतोऽमरशक्तिर्नाम राजा बभूव । तस्य त्रयः पुत्राः परमदुर्मेधसो बहुशक्तिरुग्रशक्तिरनन्तशक्तिश्चेतिनामानो बभूवुः । अथ राजा तान् शास्त्रविमुखान् आलोक्य सचिवान् आहूय प्रोवाच- “भो ! ज्ञातमेतद्भवद्भिः यन्ममैते पुत्राः शास्त्रविमुखा विवेकरहिताश्च । तत् एतान् पश्यतो मे महदपि राज्यं न सौख्य मावहति । अथवा साध्विदमुच्यते-
सो ऐसा सुना है कि, दक्षिणके देशमें एक महिलारोप्यनाम नगरहै । वहां सम्पूर्ण याचकोंके ( मनोरथ पूर्ण करनेको ) कल्पवृक्ष, बडे बडे निर्जित राजाओंकी मुकुटमणियोँकी किरणोंके समूहसे पूजित चरणयुगल, सम्पूर्ण कलाओंका पारगामी, अमरशक्ति नाम राजा था, उसके तीन पुत्र अतिदुर्बुद्धि--बहुशक्ति, उग्रशक्ति, अनन्तशक्ति नामवाले थे । तब राजा उनको शास्त्रसे विमुख देखकर मन्त्रियोंको बुलाकर बोला--“क्या यह आपको विदित है कि, जो यह मेरे पुत्र शास्त्रसे विमुख विवेक रहित हैं । सो इनको देखकर मुझको यह बडा राज्य सुख नहीं देता है । अथवा किसीने यह अच्छा कहा है कि-
अजातमृतमूर्खेभ्यो मृताजातौ सुतौ वरम् । यतस्तौ स्वल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ॥ ४ ॥
न हुए, होकर मरगये और मूर्ख इन (तीन प्रकारके ) पुत्रोंमे नहुए और होकर मरगये भले हैं, कारण कि, वे दोनों थोडे दुःखके निमित्त है, मूर्ख तो जन्मपर्यन्त जलाता है ॥ ४ ॥
वरं गर्भस्रावो वरमृतुषु नैवाभिगमनं वरं जातप्रेतो वरमपि च कन्यैव जनिता ।