पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १५७ )
सो हमारा स्वामी गरुड है सो उसके निमित्त यह परिभवका स्थान निवेदन करो जिससे अपने जातिके पराभवसे क्रोधित हुआ वैरकी अनृणताको प्राप्त होगा । अथवा जो अवलेप ( गर्व ) करेगा तोभी दुःख नहीं है । कहा है-
सुहृदि निरन्तरचित्ते गुणवति भृत्येऽनुवर्त्तिनि कलत्रे । स्वामिनि शक्तिसमेते निवेद्य दुःखं सुखी भवति ॥३७२ ॥
निरन्तर चित्तवाले सुहृद्, गुणवान् भृत्य, अनुवर्ती स्त्री, शक्तिमान् स्वामीसे अपना दुःख निवेदन कर सुखी होता है ॥ ३७२ ॥
तद्यामो वैनतेयसकाशं यतोऽसौ अस्माकं स्वामी” । तथा अनुष्ठिते सर्वे ते पक्षिणो विषण्णवदना बाष्पपूरितदृशः वैनतेयसकाशमासाद्य करुणस्वरेण फूत्कर्त्तुमारब्धाः-“अहो अब्रह्मण्यमब्रह्मण्यम् । अधुना सदाचारस्य टिट्टिभस्य भवति नाथे सति, समुद्रेण अण्डानि अपहृतानि । तत् प्रनष्टमधुना पक्षिकुलम् । अन्येऽपि स्वेच्छया समुद्रेण व्यापादयिष्यन्ते । उक्तञ्च-
सो हम गरुड़के पास जाते हैं क्यों कि, यह हमारा स्वामी है” ऐसा करनेपर सब पक्षी दुःखी मुख नेत्रोंमें आसुभरे गरुड़जीको प्राप्तहो करुणास्वरसे स्वांस लेने लगे । “अहो ! अवध्य है अवध्यहै ! ! कि, इस सदाचार टिट्टिभके अण्डे सागरने हरण करलिये । सो अब पक्षिकुल नष्ट हुआ । औरोंकोभी स्वेच्छासे सागर नष्ट करेगा । कहाहै-
एकस्य कर्म संवीक्ष्य करोत्यन्योऽपि गर्हितम् । गतानुगतिको लोको न लोकः पारमार्थिकः ॥ ३७३ ॥
एकका कुत्सित कर्म देखकर दूसरेभी वैसा करते हैं लोककी भेडा चालहै परमार्थकी नहीं ॥ ३७३ ॥
तथाच- और देखो-
चाटुतस्करदुर्वृत्तैस्तथा साहसिकादिभिः । पीड्यमानाः प्रजा रक्ष्याः कूटच्छाद्यादिभिस्तथा ॥३७४ ॥