भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( १५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

तब वे तीनों जाकर मेघनादके आगे समस्त वृत्तान्तको निवेदन कर स्थित हुए । तब कहने लगा कि-“क्या वस्तु है यह क्षुद्र हाथी क्रोध किये हुए महाजनोंके आगे ! सो मेरी सम्मति करो । मक्षिके! तू जाकर दोपहरके समय उसे मदोद्धतहाथीके कानमें वीणाशब्दकी समान शब्दकर जिससे श्रवणसुखकी लालसासे वह नेत्र मींचिलेगा, उसी समय यह खुटबढईकी चोंचसे आंख फोडा हुआ आन्धा हो प्याससे व्याकुल हुआ खाईके निकट मेरा परिवार सहित शब्द श्रवण कर जलाशय मानकर प्राप्त होगा । तब गर्तको प्राप्तहो गिरेगा और फिर मरजायगा । इसप्रकार कौशल करो तो वैर साधन होजायगा” तब यही करनेपर मक्खीके गानसुखसे नेत्र मींचतेही, खुटबढईसे आंखें फोडाहूआ मध्यान्ह समय घूमता मडकके शब्दका अनुसरण करता बडे गर्तको प्राप्तहो गिरकर मरगया । इससे मैं कहताहूं “चटका खुटबढईसे इत्यादि”

टिट्टिभ आह-“भद्रे ! एवंभवतु, सुहृद्वर्गसमुदायेन समुद्रं शोषयिष्यामि” इति निश्चित्य बकसारसमयूरादीन् समाहूय प्रोवाच-“भोः ! पराभूतोऽहं समुद्रेणाण्डकापहारेण तच्चिन्त्यतामस्य शोषणोपायः” । ते सम्मन्त्र्य प्रोचुः “अशक्ता वय समुद्रशोषणे, तत् किं वृथाप्रयासेन । उक्तञ्च-

टिट्टिभ बोला,-“भद्रे ! यही होगा सुहृद्वर्गोंके सहित सागर शोषूंगा” ऐसा निश्चय कर बक सारस मृगादिको बुलाकर बोला-“भो ! मुझे अन्डे हरण कर इस सागरने पराभूत कियाहै सो इसके सुखानेका कोई उपाय करो” । वे सम्मति कर बोले,-“सागर शोषनेमे हम असमर्थ हैं क्यों वृथा प्रयास करतेहो ।

अबलः प्रोन्नतं शत्रुं यो याति मदमोहितः ।
युद्धार्थे स निवर्त्तेत शीर्णदन्तो गजो यथा ॥ ३७१ ॥

निर्बल और उन्नत शत्रुके पास जो मदमोहित होकर युद्धार्थ जाताहै वह शीर्णदन्त हाथीकी समान युद्धके लिये निवृत्त होता है ॥ ३७१ ॥

तदस्माकं स्वामी वैनतेयः अस्ति, तत्तस्मै सर्वमेतत् परिभवस्थानं निवेद्यतां येन स्वजातिपरिभवकुपितो वैरानृण्यं गच्छति । अथवा अत्रावलेपं करिष्यति तथापि नास्ति वो दुःखम् । उक्तञ्च-