पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
पृष्ठ 175, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६० ) पञ्चतन्त्रम् ।
दूत बोला,-“भो गरुड ! कभीभी भगवान्के प्रति तुमने ऐसे वचन नहीं कहेथे सो कहतो भगवान्ने तुम्हारा क्या अपमान किया है ?” गरुड बोला,-“भगवान्के आश्रयभूत सागरने इस टिट्टिभके अण्डे ग्रहण करलिये सो यदि-सागरको दण्ड न दियागया तो मैं भगवान्का भृत्य नहीं यह मेरा निश्चय तू कह देना सो तुम शीघ्र जाकर भगवान्से कहो”। तब दूतसे प्यारसे क्रोधित हुए गरुडको जानकर भगवान् विचारने लगे। “अहो ! गरुडका क्रोध सत्यही है सो, स्वयं जाकर सन्मानपूर्वक उसको लाऊं। कहा है-
भक्तं शक्तं कुलीनञ्च न भृत्यमपमानयेत् । पुत्रवल्लालयेन्नित्यं य इच्छेच्छ्रियमात्मनः ॥ ३८२ ॥
भक्त समर्थ और कुलीन सेवकका तिरस्कार न करे जो अपना मंगल चाहे तो पुत्रवत् उसको लालन पालन करे ॥ ३८२ ॥
अन्यच्च- और भी-
राजा तुष्टोऽपि भृत्यानामर्थमात्रं प्रयच्छति । तेतु सम्मानितास्तस्य प्राणैरप्युपकुर्वते ॥ ३८३ ॥”
राजा भृत्योंपर सन्तुष्ट हो धनमात्र देता है और भृत्य सम्मानित हुए प्राण तक लगा देते हैं ॥ ३८३ ॥”
इत्येवं सम्प्रधार्य रुक्मपुरे वैनतेयसकाशं सत्वरमगमत्, वैनतेयोऽपि गृहागतं भगवन्तमवलोक्य त्रपाधोमुखः प्रणम्योवाच-“भगवन् ! त्वदाश्रयोन्मत्तेन समुद्रेण मम भृत्यस्य अण्डानि अपहृत्य ममापमानो विहितः । परं भगवल्लज्जया मया विलम्बितं नोचेदेनमहं स्थलान्तरमद्यैव नयामि, यतः स्वामिभयाच्छुनोऽपि प्रहारो न दीयते । उक्तञ्च-
ऐसा विचारकर गरुडके नगर रुक्मपुरमें गरुडके निकट बहुत शीघ्र गये । गरुड भी घर आये भगवान्को देख लज्जासे नीचे मुखकर प्रणाम कर बोला,-“भगवन् ! तुम्हारे आश्रयसे उन्मत्त हुए समुद्रने मेरे भृत्यके अण्डे लेकर मेरा अपमान किया । सो आपकी लज्जासेही देर करी नहीं तो इसे मैं आजही शुष्क करदूं, परन्तु स्वामीके भयसे कुत्तेको भी नहीं माराजाता । कहा है-