पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
हमात्मरक्षार्थं तद्वधाय उद्यमं करोमि”। दमनक आह- “भद्र ! किमत्र ज्ञेयं ? एष ते प्रत्ययः, यदि रक्तनेत्रस्त्रिशिखां भुकुटिं दधानः सृक्किणी परिलेलिहन्त्वां दृष्ट्वा भवति- तद्दुष्टबुद्धिरन्यथा सुप्रसादश्चेति तदाज्ञापय माम्, स्वाश्रयं प्रति गच्छामि । त्वया च यथा अयं मन्त्रभेदो न भवति तथा कार्य्यम् । यदि निशामुखं प्राप्य गन्तुं शक्नोषि तद्देशत्यागः कार्य्यः । यतः-
इस कारण पुरुषको उद्यम त्यागना न चाहिये” यह सुनकर संजीवक फिर उससे पूछने लगा-“भो मित्र ! मैं कैसे जानूं कि, यह दुष्टबुद्धि है । इतने समयतक उत्तरोत्तर बढेहुए स्नेहसे और प्रसन्नतासे उसको देखा कभी उसका विकार नहीं देखा । सो कह जिससे मैं अपनी रक्षा उसके वधके निमित्त उद्योग करूं” । दमनक बोला,-“भद्र ! मैं इसमें क्या जानूं । यह तुम्हारा विश्वास है ! जो लाल नेत्र शिखा किये टेढी भौंहें जीभ चाटता हुआ तुझे देखे तब जानना कि, यह दुष्टबुद्धिहे नहीं तो प्रसन्न जानना ! सो मुझे आज्ञा दो कि मैं अपने आश्रमको जाऊ । परन्तु यह हमारा मंत्रभेद न हो ऐसा तुमको करना चाहिये । और जो रात्रिके समय जानेमें समर्थ हो तो यह देश त्यागना कर । क्योंकि-
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ ३८६ ॥
कुलके निमित्त एकको त्यागना करे, ग्रामके निमित्त कुलको त्यागे, देशके निमित्त ग्रामको और आत्माके निमित्त पृथ्वीको भी त्यागे ॥ ३८६ ॥
आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान्रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ ३८७ ॥
आपत्तिके निमित्त धनकी रक्षाकरे, स्त्रियोंको धनसे रक्षाकरे, और आत्माको स्त्री और धनसे सदा रक्षाकरे ॥ ३८७ ॥
बलवताभिभूतस्य विदेशगमनं तदनुप्रवेशो वा नीतिः । तद्देशत्यागः कार्य्यः । अथवा आत्मा सामादिभिरुपायैरभिरक्षणीयः । उक्तञ्च-