भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( १६३

बलवान्से तिरस्कृत हो विदेशगमन अथवा उसका आश्रय करनाही नीति है सो देशका त्याग करना उचित है। अथवा आत्मा सामादि उपायोंसे रक्षाके योग्य है। कहा है-

अपि पुत्रकलत्रैर्वा प्राणान्रक्षेत्त पंडितः ।
विद्यमानैर्यतस्तैः स्यात्सर्वं भूयोऽपि देहिनाम् ॥ ३८८ ॥

पंडित पुत्र और कलत्रोंकेभी जानेसे प्राणोंकी रक्षा करे, कारण कि, प्राणोंके रहनेसे देहधारियोंको फिरभी सब होजाते हैं ॥ ३८८ ॥

तथाच-

आर देखो-

येन केनाप्युपायेन शुभेनाप्यशुभेन वा ।
उद्धरेद्दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥ ३८९ ॥

जिस किसी शुभ वा अशुभ उपायसे दीन आत्माका उद्धार करना, कारण कि, समर्थ होकर धर्म करसकेगा ॥ ३८९ ॥

यो मायां कुरुते मूढः प्राणत्यागे धनादिषु ।
तस्य प्राणाः प्रणश्यन्ति तैर्नष्टैर्नष्टमेव तत् ॥ ३९० ॥”

जो मूर्ख प्राणत्यागमे धनादिकोंमें ममता करता है उसके प्राण नष्ट होते हैं उनके नष्ट होनेमे वह सब नष्टहीहै ॥ ३९० ॥”

एवमभिधाय दमनकः करटकसकाशमगमत् । करटकोऽपि तमायान्तं दृष्ट्वा प्रोवाच-“भद्र ! किं कृतं तत्रभवता ?” दमनक आह-“ मया यावत् नीतिबीजानिर्वापणं कृतं परतो दैवविहितायत्तम्। उक्तञ्च यतः-

यह कह दमनक करटकके समीप गया। करटक उसे आया देखकर बोला-“भद्र ! क्या किया आपने ?” दमनक बोला-“मैंने तो नीतिबीज बोदिया आगे करना दैवके आधीन है । क्योंकि कहाहै-

पराङ्मुखेऽपि दैवेऽत्र कृत्यं कार्य्यं विपश्चिता ।
आत्मदोषविनाशाय स्वचित्तस्तम्भनाय च ॥ ३९१ ॥

दैवके पराङ्मुख होनेपरभी अपने दोष नाशकरने और स्वचित्तके स्तम्भन करनेके निमित्त बुद्धिमान्को कार्य करना चाहिये ॥ ३९१ ॥