पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तथाच- और देखो-
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी- दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति । दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ॥ ३९२॥”
उद्योगी पुरुषसिंह लक्ष्मीको प्राप्त होते हैं । दैव देता है यह कायर पुरुष कहते हैं दैवको त्याग आत्मशक्तिसे पुरुषार्थ करो यत्न करनेपर यदि सिद्ध न हो तो किसीका क्या दोष है ॥ ३९२ ॥”
करटक आह-“तत् कथय कीदृक् त्वया नीतिबीजं निर्बापितम् ?” । सोऽब्रवीत्-“मया अन्योन्यं ताभ्यां मिथ्याप्रजल्पनेन भेदस्तथा विहितो यथा भूयोऽपि मन्त्रयन्तौ एकस्थानस्थितौ न द्रक्ष्यसि” । करटक आह-“अहो ! न युक्तं भवता विहितं यत्परस्परं तौ स्नेहार्द्रहृदयौ सुखाश्रयौ कोपसागरे प्रक्षिप्तौ । उक्तञ्च-
करटक बोला-“सो कहो किस प्रकार आपने नीतिबीज बोया ?” । वह बोला-“मैंने परस्पर उन दोनोंका मिथ्या उक्तियोंसे इस प्रकार भेद किया है कि, फिर उनको एक स्थानमें मंत्रणा करते हुए तुम न देखोगे” करटक बोला,-“अहो ! आपने यह युक्त नहीं किया जो परस्पर स्नेहसे आर्द्रहृदयवाले सुखके आश्रय उन दोनोंको कोपसागरमें डाला । कहाहै-
अविरुद्धं सुखस्थं यो दुःखमार्गे नियोजयेत् । जन्मजन्मान्तरे दुःखी स नरः स्यादासंशयम् ॥ ३९३ ॥
अविरुद्ध और सुखमें स्थित हुओंको दुःखमार्गमें लगाता है वह मनुष्य जन्म जन्मान्तरमें दुःखी होता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९३ ॥
अपरं त्वं यद्भेदमात्रेणापि तुष्टस्तदपि अयुक्तं यतः सर्वोऽपि जनो विरूपकरणे समर्थो भवति नोपकर्तुम् । उक्तञ्च-
और जो तू भेदमात्रसेही सन्तुष्ट है सोभी अयुक्त है जो कि, सम्पूर्ण जन विरूप करनेमें समर्थ होता है उपकार करनेको नहीं । कहाहै-