पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १७३ )
भावार्जितं शुभमथाप्यशुभं निकामं
यद्भावि तद्भवति नात्र विचारहेतुः ॥ ४०३ ॥
इस लोकमें शरीरधारियोंको अपने कर्मका विपाक होताही है जो कि, नित्य अपने कर्तव्यसे अच्छी प्रकार कियाही है । तथा जो शुभ अशुभभावसे अर्जन किया है और जो होनहार है वह होगाही इसमें विचारकी आवश्यकता नहीं ॥ ४०३ ॥
अपरं च, अन्यत्र गतस्यापि मे कस्यचित् दुष्टसत्त्वस्य मांसाशिनः सकाशान्मृत्युर्भविष्यति, तद्वरं सिंहात । उक्तञ्च-
और अन्यस्थानमें जाकरभी मेरी किसी मांसभक्षी दुष्ट जीवसे मृत्यु होगी तो उससे तो सिंहके हाथसे मरना भला है । कहाहै-
महद्भिः स्पर्द्धमानस्य विपदेव गरीयसी ।
दन्तभङ्गोऽपि नागानां श्लाघ्यो गिरिविदारणे ॥ ४०४ ॥
बडे पुरुषोंसे स्पर्धा करनेसे विपत्तिभी अच्छी है पर्वतके विदीर्ण करनेमें हाथियोंका दन्तभङ्गभी श्रेयस्कर है ॥ ४०४ ॥
तथाच-
तैसेही-
महतोऽपि क्षयं लब्ध्वा श्लाघ्यं नीचोऽपि गच्छति ।
दानार्थी मधुपो यद्वद्गजकर्णसमाहतः ॥ ४०५ ॥
नीच प्राणी बडे मनुष्योंसे क्षयको प्राप्तहोकर श्लाघ्यताको प्राप्त होता है जैसे दानकी इच्छा करनेवाला हाथीके कर्णसे ताडित हुआ भौंरा ॥ ४०५ ॥
एवं निश्चित्य स स्खलितगतिर्मन्दं मन्दं गत्वा सिंहाश्रयं पश्यन्नपठत, अहो साधु इदमुच्यते-
ऐसा निश्चय कर छिन्नगतिसे सजीवक मंद मंद जाकर सिंहका आश्रय देखता हुआ यह श्लोक पढने लगा । अहो यह सत्य कहाहै-
अन्तर्लीनभुजङ्गमं गृहमिव व्यालाकुलं वा वनं
ग्राहाकीर्णमिषाभिरामकमलच्छायासनाथं सरः ।
नानादुष्टजनैरसत्यवचनासक्तैरनार्यैर्वृतं
दुःखेन प्रतिगम्यते प्रचकितै राज्ञां गृहं वारिधिवत् ॥४०६॥