पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
प्राणभयसे भागगया, चतुरकभी सहज २ उसका मांस खाता भया, इससे मैं कहता हूं "परका पीडन करके इत्यादि"।
अथ दमनके गते सञ्जीवकश्चिन्तयामास, "अहो ! किमेतन्मया कृतं यच्छष्पादोऽपि मांसाशिनस्तस्यानुगः संवृत्तः। अथवा साधु इदमुच्यते-
तब दमनकके जानेसे संजीवक विचारने लगा,–"अहो यह मैंने क्या किया,जो मैं घास खानेवाला इस मांसभोजीका अनुगामी हुआ।अथवा यह सत्य कहा है कि-
अगम्यान्यः पुमान्याति असेव्यांश्च निषेवते । स मृत्युमुपगृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा ॥ ४०१ ॥
जो पुरुष अगम्योंमें गमन करता है, असेव्योंको सेवन करता है, वह मृत्युको प्राप्त होता है जैसे खच्चरी गर्भके धारण करनेसे ॥ ४०१ ॥
तत् किं करोमि, क्व गच्छामि, कथं मे शान्तिर्भविष्यति, अथवा तमेव पिङ्गलकं गच्छामि, कदाचिन्मां शरणागतं रक्षति प्राणैर्न वियोजयति । यत उक्तञ्च-
सो मैं क्या करूं कहां जाऊं किस प्रकार मेरी शान्ति होगी अथवा उसी पिंगलकके पास जाऊं कदाचित् मुझ शरण आये हुएको प्राणोंसे वियुक्त न करेगा रक्षा करेगा। कहाहै-
धर्मार्थं यततामपीह विपदो दैवाद्यदि स्युः क्वचित् तत्तासामुपशान्तये सुमतिभिः कार्य्यो विशेषान्नयः । लोके ख्यातिमुपागतात्र सकले लोकोक्तिरेषा यतो दग्धानां किल वह्निना हितकरः सेकोऽपि तस्योद्भवः॥४०२॥
इस लोकमें धर्मार्थ यत्न करनेमें यदि दैवात् कुछ विपत्तिभी होजाय, तो उसकी शान्तिके लिये सुमतियोंको विशेष नीति करनी चाहिये कारण कि, सब लोकमें यह बात विख्यात है कि, जलेहुए स्थानपर अग्निका सेकही हितकारक होता है ॥ ४०२ ॥
तथाच-
औरभी कहाहै-
लोकेऽथवा तनुभृतां निजकर्मपाकं नित्यं समाश्रितवतां सुहितक्रियाणाम् ।