पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १७१ )
विश्वास कर अपने शरीरको देगा,” सिंह बोला—“भो ! यदि ऐसा है तो यह सुन्दरतरहै, यह व्यवहारका कर्महै इसमें धर्मका प्रतिभू करो”। तब सिंहके वचनके उपरान्त वृक शृगालोंने उसकी दोनों कोख विदीर्ण करदीं और शंकुकर्ण मरगया । तब वज्रदंष्ट्र चतुरकसे बोला—“भो चतुरक ! जबतक मैं नदीमें जाकर स्नान देवतार्चनविधि करके आताहू तबतक तुझे यहा सावधान रहना चाहिये” ऐसा कह नदीको गया । उसके जानेमें चतुरक विचारने लगा । “कैसे मुझ इकलेकोही यह ऊंट खानेको मिलै” यह विचार क्रव्यमुखसे बोला—“भो क्रव्यमुख ! आप भूखेहो सो जबतक स्वामी न आवे तबतक तुम इस ऊंटके मांसको खाओ मैं तुझको स्वामीसे निर्दोष प्रतिपादन करूंगा.” वहभी यह वचन सुन जबतक कुछ मांस खाता है तबतक चतुरकने कहा—“भो क्रव्यमुख ! स्वामी आताहै सो इसको त्यागकर दूरहो, जो इसके भक्षणमे विकल्प न हो” ऐसा करनेपर सिंह आकर ऊंटको देखने लगा तो, रीताहृदय ऊंट देखा । तब टेढी भौं करके क्रोधकर बोला—“अहो ! किसने यह ऊंट झूठा कर दिया, जिससे उसकोभी मारू” ऐसा कहनेपर क्रव्यमुख चतुरकका मुख देखने लगा “निश्चयही उसको कह जिससे मेरी शान्ति हो” तब चतुरक हँसकर बोला—“भो ! मुझको अनादर कर मांस खाकर अब मेरा मुख देखता है सो उस दुर्नीतिरुपी वृक्षका फल आस्वादन करो” । यह सुनकर क्रव्यमुख जीवनाशके भयसे दूरस्थानमें चलागया, इसी समय उस मार्गमे ऊंटोंका समूह बोझसे लादाहुआ आया, उसके आगे ऊंटके गलेमें एक बडा घण्टा बँधाथा । उसके शब्दको दूरसेही सुनकर सिंह जम्बूकसे बोला—“भद्र ! देखो तो यह किसका कठोर शब्द सुनाई देता है जो पहले सुना नहीं था” । यह सुनकर चतुरक कुछ दूर वनान्तरमें जाकर, शीघ्रतासे आकर बोला—“स्वामिन् ! जाओ जाओ यदि जानेमें समर्थ होतो”। वह बोला—“भद्र ! क्यों मुझको व्याकुलकरते हो । सो कहो यह क्या है.” चतुरक बोला—“स्वामिन् ! ये धर्मराज तुम्हारे ऊपर क्रोध किये हैं कि, इसने अकालमें यह हमारा ऊंट नाश किया सो हजार गुणा उस ऊंटका इससे ग्रहण करूंगा ऐसा कह महापरिमाण ग्रहण कर आगेको ऊंटमें घंटा बाध ऊंटमें मन लगाय उसके पितामहादिको लिये वैर लेनेके निमित्त आताही है”। सिंहभी यह वचन सुन दूरसे देख मरे ऊंटको छोड