पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
भाषाटीकासमेतम् । ( १७१ )
विश्वास कर अपने शरीरको देगा,” सिंह बोला—“भो ! यदि ऐसा है तो यह सुन्दरतरहै, यह व्यवहारका कर्महै इसमें धर्मका प्रतिभू करो”। तब सिंहके वचनके उपरान्त वृक शृगालोंने उसकी दोनों कोख विदीर्ण करदीं और शंकुकर्ण मरगया । तब वज्रदंष्ट्र चतुरकसे बोला—“भो चतुरक ! जबतक मैं नदीमें जाकर स्नान देवतार्चनविधि करके आताहू तबतक तुझे यहा सावधान रहना चाहिये” ऐसा कह नदीको गया । उसके जानेमें चतुरक विचारने लगा । “कैसे मुझ इकलेकोही यह ऊंट खानेको मिलै” यह विचार क्रव्यमुखसे बोला—“भो क्रव्यमुख ! आप भूखेहो सो जबतक स्वामी न आवे तबतक तुम इस ऊंटके मांसको खाओ मैं तुझको स्वामीसे निर्दोष प्रतिपादन करूंगा.” वहभी यह वचन सुन जबतक कुछ मांस खाता है तबतक चतुरकने कहा—“भो क्रव्यमुख ! स्वामी आताहै सो इसको त्यागकर दूरहो, जो इसके भक्षणमे विकल्प न हो” ऐसा करनेपर सिंह आकर ऊंटको देखने लगा तो, रीताहृदय ऊंट देखा । तब टेढी भौं करके क्रोधकर बोला—“अहो ! किसने यह ऊंट झूठा कर दिया, जिससे उसकोभी मारू” ऐसा कहनेपर क्रव्यमुख चतुरकका मुख देखने लगा “निश्चयही उसको कह जिससे मेरी शान्ति हो” तब चतुरक हँसकर बोला—“भो ! मुझको अनादर कर मांस खाकर अब मेरा मुख देखता है सो उस दुर्नीतिरुपी वृक्षका फल आस्वादन करो” । यह सुनकर क्रव्यमुख जीवनाशके भयसे दूरस्थानमें चलागया, इसी समय उस मार्गमे ऊंटोंका समूह बोझसे लादाहुआ आया, उसके आगे ऊंटके गलेमें एक बडा घण्टा बँधाथा । उसके शब्दको दूरसेही सुनकर सिंह जम्बूकसे बोला—“भद्र ! देखो तो यह किसका कठोर शब्द सुनाई देता है जो पहले सुना नहीं था” । यह सुनकर चतुरक कुछ दूर वनान्तरमें जाकर, शीघ्रतासे आकर बोला—“स्वामिन् ! जाओ जाओ यदि जानेमें समर्थ होतो”। वह बोला—“भद्र ! क्यों मुझको व्याकुलकरते हो । सो कहो यह क्या है.” चतुरक बोला—“स्वामिन् ! ये धर्मराज तुम्हारे ऊपर क्रोध किये हैं कि, इसने अकालमें यह हमारा ऊंट नाश किया सो हजार गुणा उस ऊंटका इससे ग्रहण करूंगा ऐसा कह महापरिमाण ग्रहण कर आगेको ऊंटमें घंटा बाध ऊंटमें मन लगाय उसके पितामहादिको लिये वैर लेनेके निमित्त आताही है”। सिंहभी यह वचन सुन दूरसे देख मरे ऊंटको छोड
( १७२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
प्राणभयसे भागगया, चतुरकभी सहज २ उसका मांस खाता भया, इससे मैं कहता हूं "परका पीडन करके इत्यादि"।
अथ दमनके गते सञ्जीवकश्चिन्तयामास, "अहो ! किमेतन्मया कृतं यच्छष्पादोऽपि मांसाशिनस्तस्यानुगः संवृत्तः। अथवा साधु इदमुच्यते-
तब दमनकके जानेसे संजीवक विचारने लगा,–"अहो यह मैंने क्या किया,जो मैं घास खानेवाला इस मांसभोजीका अनुगामी हुआ।अथवा यह सत्य कहा है कि-
अगम्यान्यः पुमान्याति असेव्यांश्च निषेवते । स मृत्युमुपगृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा ॥ ४०१ ॥
जो पुरुष अगम्योंमें गमन करता है, असेव्योंको सेवन करता है, वह मृत्युको प्राप्त होता है जैसे खच्चरी गर्भके धारण करनेसे ॥ ४०१ ॥
तत् किं करोमि, क्व गच्छामि, कथं मे शान्तिर्भविष्यति, अथवा तमेव पिङ्गलकं गच्छामि, कदाचिन्मां शरणागतं रक्षति प्राणैर्न वियोजयति । यत उक्तञ्च-
सो मैं क्या करूं कहां जाऊं किस प्रकार मेरी शान्ति होगी अथवा उसी पिंगलकके पास जाऊं कदाचित् मुझ शरण आये हुएको प्राणोंसे वियुक्त न करेगा रक्षा करेगा। कहाहै-
धर्मार्थं यततामपीह विपदो दैवाद्यदि स्युः क्वचित् तत्तासामुपशान्तये सुमतिभिः कार्य्यो विशेषान्नयः । लोके ख्यातिमुपागतात्र सकले लोकोक्तिरेषा यतो दग्धानां किल वह्निना हितकरः सेकोऽपि तस्योद्भवः॥४०२॥
इस लोकमें धर्मार्थ यत्न करनेमें यदि दैवात् कुछ विपत्तिभी होजाय, तो उसकी शान्तिके लिये सुमतियोंको विशेष नीति करनी चाहिये कारण कि, सब लोकमें यह बात विख्यात है कि, जलेहुए स्थानपर अग्निका सेकही हितकारक होता है ॥ ४०२ ॥
तथाच-
औरभी कहाहै-
लोकेऽथवा तनुभृतां निजकर्मपाकं नित्यं समाश्रितवतां सुहितक्रियाणाम् ।
भाषाटीकासमेतम् । ( १७३ )
भावार्जितं शुभमथाप्यशुभं निकामं
यद्भावि तद्भवति नात्र विचारहेतुः ॥ ४०३ ॥
इस लोकमें शरीरधारियोंको अपने कर्मका विपाक होताही है जो कि, नित्य अपने कर्तव्यसे अच्छी प्रकार कियाही है । तथा जो शुभ अशुभभावसे अर्जन किया है और जो होनहार है वह होगाही इसमें विचारकी आवश्यकता नहीं ॥ ४०३ ॥
अपरं च, अन्यत्र गतस्यापि मे कस्यचित् दुष्टसत्त्वस्य मांसाशिनः सकाशान्मृत्युर्भविष्यति, तद्वरं सिंहात । उक्तञ्च-
और अन्यस्थानमें जाकरभी मेरी किसी मांसभक्षी दुष्ट जीवसे मृत्यु होगी तो उससे तो सिंहके हाथसे मरना भला है । कहाहै-
महद्भिः स्पर्द्धमानस्य विपदेव गरीयसी ।
दन्तभङ्गोऽपि नागानां श्लाघ्यो गिरिविदारणे ॥ ४०४ ॥
बडे पुरुषोंसे स्पर्धा करनेसे विपत्तिभी अच्छी है पर्वतके विदीर्ण करनेमें हाथियोंका दन्तभङ्गभी श्रेयस्कर है ॥ ४०४ ॥
तथाच-
तैसेही-
महतोऽपि क्षयं लब्ध्वा श्लाघ्यं नीचोऽपि गच्छति ।
दानार्थी मधुपो यद्वद्गजकर्णसमाहतः ॥ ४०५ ॥
नीच प्राणी बडे मनुष्योंसे क्षयको प्राप्तहोकर श्लाघ्यताको प्राप्त होता है जैसे दानकी इच्छा करनेवाला हाथीके कर्णसे ताडित हुआ भौंरा ॥ ४०५ ॥
एवं निश्चित्य स स्खलितगतिर्मन्दं मन्दं गत्वा सिंहाश्रयं पश्यन्नपठत, अहो साधु इदमुच्यते-
ऐसा निश्चय कर छिन्नगतिसे सजीवक मंद मंद जाकर सिंहका आश्रय देखता हुआ यह श्लोक पढने लगा । अहो यह सत्य कहाहै-
अन्तर्लीनभुजङ्गमं गृहमिव व्यालाकुलं वा वनं
ग्राहाकीर्णमिषाभिरामकमलच्छायासनाथं सरः ।
नानादुष्टजनैरसत्यवचनासक्तैरनार्यैर्वृतं
दुःखेन प्रतिगम्यते प्रचकितै राज्ञां गृहं वारिधिवत् ॥४०६॥
( १७४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
भीतर स्थित है सर्प जिसमें ऐसे घरकी समान, हिंसक जीवोंसे व्याप्त वनकी समान, ग्राह (नाकों) से युक्त मनोहर छायावाले कमल खिले सरोवरकी समान, अनेक दुष्टजन असत्य वचनोंमे रत असाधुओंसे पूर्ण राजाओंका घर सागरकी समान भीत हुए श्रेष्ठ पुरुषोंसे दुःखसे जाया जाता है ॥४०६॥
एवं पठन् दमनकोक्ताकारं पिङ्गलकं दृष्ट्वा प्रचकितः संवृतशरीरो दूरतरं प्रणामकृतिं विनापि उपविष्टः पिङ्गलकोऽपि तथाविधं तं विलोक्य दमनकवाक्यं श्रद्दधानः कोपात्तस्योपरि पपात । अथ सञ्जीवकः खरनखरविकर्त्तितपृष्ठः शृङ्गाभ्यां तदुदरमुल्लिख्य कथमपि तस्मादपेतः । शृङ्गाभ्यां हन्तुमिच्छन् युद्धायावस्थितः । अथ द्वौ अपि तौ पुष्पितपलाशप्रतिमौ परस्परवधकांक्षिणौ दृष्ट्वा करटको दमनकमाह- “भो मूढमते ! अनयोर्विरोधं वितन्वता त्वया साधु न कृतम् । न च त्वं नीतितत्त्वं वेत्सि । नीतिविद्भिरुक्तञ्च,-
इस प्रकार पढ़ता हुआ दमनकके कहे आकारकी समान पिंगलकको देखकर चकित और रक्षित शरीरसे बिनाही प्रणाम किये दूर बैठगया । पिंगलकभी इस प्रकार उसको देख दमनकका वाक्य सत्य मानकर कोपसे उसके ऊपर टूट पडा तब संजीवक उसके तीक्ष्ण नखोंसे विदीर्ण पीठवाला; सींगोंसे उसके उदरमें प्रहार कर किसी प्रकार उससे अलग हुआ; सींगोंसे मारनेकी इच्छा कर युद्धके निमित्त स्थित हुआ, तब दोनोंही वह फूले ढाककी समान हुए परस्पर वधकी आकांक्षासे दोनोंको देख करटक दमनकसे बोला,—“भो मूढमते ! इन दोनोंको विरोध करते हुए तैने अच्छा नहीं किया तू नीतिका तत्व नहीं जानता । नीतिजाननेवालोंने कहाहै-
कार्याण्युत्तमदण्डसाहसफलान्यल्पायाससाध्यानि ये
प्रीत्या संशमयन्ति नीतिकुशलाः साध्वैव ते मन्त्रिणः ।
निःसारल्पफलानि ये त्वविधिना वाञ्छन्ति दण्डोद्यमै-
स्तेषां दुर्णयचेष्टितैर्नरपतेरारोप्यते श्रीस्तुलाम् ॥ ४०७ ॥
जो कार्य्य उत्तम दंड साहसके फलवाले और कष्टसाध्य हैं नीतिकुशल मंत्री वे कार्य्य प्रीति और साम उपायसेही निर्बांहित करते हैं और जो अन्याय तथा
भाषाटीकासमेतम्। ( १७५ )
युद्धके उद्योगसे अल्प फलकी वांछा करते हैं उन दुर्नीति चेष्टावाले राजोंकी लक्ष्मी सन्देहमें आरोपण की जाती है ॥ ४०७ ॥
तद्यदि स्वाम्यभिघातो भविष्यति तत् किं त्वदीय मन्त्रबुद्ध्या क्रियते। अथ सञ्जीवको न वध्यते तथापि अभव्यं यतः प्राणसन्देहात् तस्य च वधः, तन्मूढ ! कथं त्वं मन्त्रिपदमभिलषसि सामसिद्धिं न वेत्सि, तद्वृथा मनोरथोऽयं ते दण्डरुचेः। उक्तञ्च-
सो यदि स्वामीका नाश होगा तो क्या तेरी मंत्रबुद्धिसे किया जाय । और सञ्जीवक न मरे तो भी अशुभ होगा, जो कि, प्राणसन्देहसे उसका वध है सो मूर्ख ! किसप्रकार तू मन्त्रीपदकी अभिलाषा करता है साम सिद्धिको नहीं जानता सो दण्डरुचि करनेवाले तेरा यह मनोरथ वृथा है । कहा है-
सामादिदण्डपर्यन्तो नयः प्रोक्तः स्वयम्भुवा । तेषां दण्डस्तु पापीयांस्तं पश्चाद्विनियोजयेत् ॥ ४०८ ॥
सामसे लेकर दण्ड पर्य्यन्त ब्रह्माने नीति कही है उसमें दंड पापी है उसको पीछे नियुक्त करना चाहिये ॥ ४०८ ॥
तथाच- और देखो-
साम्नैव यत्र सिद्धिर्न तत्र दण्डो बुधेन विनियोज्यः । पित्तं यदि शर्करया शाम्यति कोऽर्थः पटोलेन ॥ ४०९ ॥
जहा साम उपायसेही सिद्धि होती है पंडितको वहा दंड प्रयुक्त नहीं करना चाहिये, यदि मिश्री शर्करासेही पित्त शान्त होजाय तो पटोल देनेसे क्या फायदा ॥ ४०९ ॥
तथाच- और भी-
आदौ साम प्रयोक्तव्यं पुरुषेण विजानता। सामसाध्यानि कार्याणि विक्रियां यान्ति न काचित्४१०
ज्ञानी पुरुषोंको प्रथम साम उपाय प्रयोग करना चाहिये सामसे सिद्ध हुए कार्य्य विकारको प्राप्त नहीं होते हैं ॥ ४१० ॥
( १७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
न चन्द्रेण न चौषध्या न सूर्येण न वह्निना । साम्नैव विलयं याति विद्वेषिप्रभवं तमः ॥ ४११ ॥
चन्द्रमा, औषधी, सूर्य, अग्निसे विद्वेषतासे उत्पन्न हुआ अंधकार दूर नहीं होता किन्तु साम उपायसेही दूर होता है ॥ ४११ ॥
तथा यत् त्वं मन्त्रित्वमभिलषसि तदपि अयुक्तं यतस्त्वं मन्त्रगतिं न वेत्सि । यतः पञ्चविधो मन्त्रः स च कर्म्मणामारम्भोपायः, पुरुषद्रव्यसम्पत, देशकालविभागो, विनिपातप्रतीकारः। कार्य्यसिद्धिश्चेति। सोऽयं स्वाम्यमात्ययोरेकतमस्य किंवा द्वयोरपि विनिपातः समुत्पद्यते लग्नः। तद्यदि काचिच्छक्तिरस्ति तद्विचिन्त्यतां विनिपातप्रतीकारः, भिन्नसन्धाने हि मन्त्रिणां बुद्धिपरीक्षा, तन्मूर्ख ! तत् कर्त्तुमसमर्थस्त्वं यतो विपरीतबुद्धिरसि। उक्तञ्च-
और जो तू मन्त्रीपदकी अभिलाषा करता है सोभी अयुक्त है जो कि, तू मंत्रकी गतिको नहीं जानता है जो कि, पांचप्रकारका मंत्र होताहै-कर्मके आरंभका उपाय करना, उपयुक्त कर्मचारियोंकी द्रव्य सम्पत्ति, देश कालका विभाग ( इस समयदान-इस समय दंडका प्रयोग इत्यादि ) अपायका प्रतीकार करना और कार्यसिद्धि । सो यह पिंगलक और संजीवक दोनों स्वामी भृत्यमेंसे एकका वा दोनोंका मरण होना उपस्थितहै । सो यदि कोई शक्ति हो तो इस अनिष्ट अपायका प्रतीकार करो भिन्न ( १ ) सन्निधानमेही मंत्रियोंकी बुद्धिकी परीक्षा कीजातीहै सो हे मूर्ख ! यह करनेमें तू असमर्थ है कारण कि, विपरीतबुद्धिहै । कहाहै-
मंत्रिणां भिन्नसन्धाने भिषजां सान्निपातिके । कर्मणि व्यज्यते प्रज्ञा स्वस्थे को वा न पण्डितः ॥४१२ ॥
पृथक् हुओंको मिलानेमें मंत्रियोंकी, सन्निपात रोगके कर्ममें वैद्योंकी बुद्धि देखी जाती है स्वस्थतामें कौन पंडित नहीं है ॥ ४१२ ॥
( १ ) द्वेषियोंकामिलाप कराना ।
भाषाटीकासमेतम् । ( १७७ )
अन्यच्च-
औरभी-
घातयितुमेव नीचः परकार्य्यं वेत्ति न प्रसाधयितुम् ।
पातयितुमेव शक्तिर्नाखोरुद्धर्त्तुमन्नपिटम् ॥ ४१३ ॥
नीच पराया कार्य नष्ट करना ही जानता है सिद्ध करना नहीं । चूहेकी अन्न पिटारीके गिरा देनेकीही शक्ति है उठारखनेकी नहीं ॥ ४१३ ॥
अथवा न ते दोषोऽयं स्वामिनो दोषो यस्ते वाक्यं श्रद्दधाति । उक्तञ्च-
अथवा यह तेरा दोष नहीं स्वामीका दोष है जो तेरे वचनमें श्रद्धा की, कहाहै-
नराधिपा नीचजनानुवर्त्तिनो बुधोपदिष्टेन पथा न यान्ति ये।
विशन्त्यतो दुर्गममार्गनिर्गमं समस्तसम्बाधमनर्थपञ्जरम् ४१४
जो राजा नीच जनोंसे सेवित होते हैं वे पंडितोंके उपदेश किये मार्गसे नहीं चलते हैं, इस कारण वे निकलनेके मार्गसे रहित समस्त बाधाओंसे युक्त अनर्थके समूह दुर्गम मार्गमें प्रवेश करते हैं ॥ ४१४ ॥
तद्यदि त्वमस्य मन्त्री भविष्यसि तदा अन्योऽपि कश्चिन्न अस्य समीपे साधुजनः समेष्यति । उक्तञ्च-
सो यदि तू इसका मन्त्री होगा तो दूसरा कोई साधु पुरुष इसके समीप न आवेगा । कहाहै-
गुणालयोऽप्यसन्मन्त्री नृपतिर्नाधिगम्यते ।
प्रसन्नस्वादुसलिलो दुष्टग्राहो यथा ह्रदः ॥ ४१५ ॥
गुणोंका स्थान राजा असन्मन्त्रीजनोंसे घिराहो तो उसके निकट कोई नहीं जाता है प्रसन्न ( निर्मल ) स्वादिष्ट जलवाला सरोवर जैसे नाकेसे युक्त होनेसे अगम्य होताहै ॥ ४१५ ॥
तथाच-शिष्टजनरहितस्य स्वामिनोऽपि नाशो भविष्यति उक्तञ्च-
तथाच-शिष्टजनरहित स्वामीकाभी नाश होगा । कहाहै-
चित्रास्वादकथैर्भृत्यैरनायासितकार्मुकैः ।
ये रमन्ते नृपास्तेषां रमन्ते रिपवः श्रिया ॥ ४१६ ॥
१२
( १७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जो राजा चित्रविचित्र कथाके आस्वादवाले धनुष न चढानेवाले भृत्योंसे रमण करते हैं ( राजकाज नहीं करते हैं ) शत्रु उनकी लक्ष्मीसे रमण करते हैं ॥ ४१६ ॥
तत् किं मूर्खोपदेशेन, केवलं दोषो न गुणः। उक्तञ्च-
सो मूर्खके उपदेशसे क्या केवल दोषही है गुण नहीं। कहाहै-
नानाम्यं नमते दारु नाश्मनि स्यात्क्षुरक्रिया ।
सूचीमुख विजानीहि नाशिष्यायोपदिश्यते ॥ ४१७ ॥
नहीं झुकने योग्य काष्ठ टेढ़ा नहीं होता, पत्थरका क्षौरकर्म नहीं होता, अशिष्यको उपदेश नदे इसमें सूचीमुखका दृष्टान्त है ॥ ४१७ ॥
दमनक आह-"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्-
दमनक बोला-"यह कैसे ?" वह बोला-
कथा १७.
अस्ति कस्मिंश्चित् पर्वतैकदेशे वानरयूथम् । तच्च कदाचित् हेमन्तसमये अतिकठोरवातसंस्पर्शवेपमानकलेवरं तुषारवर्षोद्धतप्रवर्षघनधारानिपातसमाहतं न कथञ्चित् शान्तिमगमत् । अथ केचित् वानरा वह्निकणसदृशानि गुञ्जाफलानि अवचित्य वह्निवाञ्छ्या फूत्कुर्वन्तः समन्तात् तस्थुः। अथ सूचीमुखो नाम पक्षी तेषां तं वृथायास मवलोक्य प्रोवाच-"भोः ! सर्वे मूर्खाः यूयं, नैते वह्निकणाः, गुञ्जाफलानि एतानि, तत् किं वृथा श्रमेण, न एतस्मात् शीतरक्षा भविष्यति । तत् अन्विष्यतां कश्चित् निर्वातो वनप्रदेशो गुहा वा गिरिकन्दरं वा । अद्यापि साटोपा मेघा दृश्यन्ते" । अथ तेषामेकतमो वृद्धवानरः तमुवाच-"भो मूर्ख ! किं तव अनेन व्यापारेण, तद्गम्यताम् । उक्तञ्च-
किसी पर्वतपर वानरोंका यूथ है वह एक समय हेमन्तसमयमें अति कठोर पवनके लगनेसे कंपितशरीर शीत और वर्षासे उद्धत घनवर्षाके धारानिपातसे
भाषाटीकासमेतम् । ( १७९ )
समाहत हुआ किसी प्रकार शान्त न हुआ । तब कोई वानर अग्निकणकी समान चोंटलियोंको इकट्ठाकर अग्निकी इच्छासे फूंक मारते हुए चारों ओरसे स्थित हुए । तब सूचीमुख नाम पक्षी उनके उस वृथा परिश्रमको देखकर बोला— "भोः ! तुम सब मूर्ख हो । यह अग्निकण नहीं हैं, यह चोंटलीहैं क्यों वृथा परिश्रम करतेहो । इससे शीत रक्षा न होगी, सो ढूँढो कोई पवनरहित वन-स्थान गुहा वा पर्वतकदरं अबभी मडल बाधे हुए मेघ दीखते हैं" । तब उन-मेसे एक बूढा वानर उससे बोला—"भो मूर्ख ! तुझे इससे क्या प्रयोजन है चलाजा । कहाहै—
मुहुर्विघ्नितकर्माणं द्यूतकारं पराजितम् ।
नालापयेद्विवेकज्ञो यदीच्छेत्सिद्धिमात्मनः ॥ ४१८ ॥
वारंवार कर्ममें विघ्न पानेवाला, जुआ खेलनेवाला, पराजित इनसे यदि अपने मगलकी इच्छा हो तो वार्ता न करे ॥ ४१८ ॥
तथाच—
तैसेही—
आखेटकं वृथा क्लेशं मूर्खं व्यसनसंस्थितम् ।
आलापयति यो मूढः स गच्छति पराभवम् ॥ ४१९ ॥"
शिकारी, वृथा क्लेशकारी, मूर्ख, दुर्व्यसनमें स्थितसे जो वार्ता करता है वह पराभवको प्राप्त होता है ॥ ४१९ ॥"
सोऽपि तमनादृत्य भूयोऽपि वानराननवरतमाह—
"भोः ! किं वृथा क्लेशेन" अथ यावदसौ न कथंचित् प्रलपन्विरमति तावदेकेन वानरेण व्यर्थश्रमत्वात् कुपितेन पक्षाभ्यां गृहीत्वा शिलायामास्फालित उपर- तश्चातोऽहं ब्रवीमि, "नानाम्यं नमते दारु" इत्यादि।
वह भी उसको अनादर कर बारंबार बानरोसे वही वचन कहने लगा— "भो ! वृथाक्लेशसे क्या है" । सो जब यह किसी प्रकार प्रलापसे न शान्त हुआ तब एक वृथा श्रमसे क्रुद्ध हुए वानरने उसके पक्ष पकड कर शिलापर पट- ककर मार दिया, इससे मैं कहता हू "अनमित काष्ठ नहीं नमता इत्यादि" ।
( १८० ) पञ्चतन्त्रम् ।
तथाच-
तैसेही-
उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये ।
पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्द्धनम् ॥ ४२० ॥
मूर्खोंको उपदेश करना कोपके वास्ते है शान्तिको नहीं सर्पोंको दूध पिलाना केवल विष बढानेके निमित्त है ॥ ४२० ॥
अन्यच्च-
औरभी-
उपदेशो न दातव्यो यादृशे तादृशे जने ।
पश्य वानरमूर्खेण सुगृही निर्गृहीकृतः ॥ ४२१ ॥"
जैसे तैसे मनुष्यको उपदेश देना न चाहिये देखो एक मूर्ख वानरने उत्तम गृहस्थ घरसे शून्य कर दिया ॥ ४२१ ॥"
दमनक आह-"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत् ।
दमनक बोला-"यह कैसे ?" वह बोला-
कथा १८.
अस्ति कस्मिंश्चित् वनोद्देशे शमीवृक्षः । तस्य लम्बमानशिखायां कृतावासौ अरण्यचटकदम्पती वसतः स्म । अथ कदाचित् तयोः सुखसंस्थयोर्हैमन्तमेघो मन्दं मन्दं वर्षितुमारब्धः । अत्रान्तरे कश्चित् शाखामृगो वातासारसमाहतः प्रोद्गलितशरीरो दण्डवीणां वादयन् वेपमानः तत शमीमूलमासाद्य उपविष्टः । अथ तं तादृशमवलोक्य चटका प्राह-"भो भद्र !
किसी एक वनके स्थानमें शमीका पेड था । उसकी लम्बमान शिखामें निवास करनेवाले बनेले चटक चटका रहतेथे । एक समय सुखसे बैठे हुए उन दोनोंके हेमन्त कालका मेघ मन्द २ वर्षने लगा । इसी समय कोई शाखामृग ( वानर ) पवन वर्षासे हत हुआ वर्षाके जलसे भीजा शरीरवाला दंडवीणाको बजाता हुआ कंपित हुआ, उस शेमलके नीचे आकर बैठा उसकी यह दशा देख चटका बोली,-"भो भद्र !
भाषाटीकासमेतम् । ( १८१ )
हस्तपादसमोपेतो दृश्यसे पुरुषाकृतिः ।
शीतेन भिद्यसे मूढ ! कथं न कुरुषे गृहम् ॥ ४२२ ॥”
हाथ पैरसे युक्त हुए तुम पुरुषाकार दीखते हो और हे मूर्ख ! शीतसे भेदित होकर भी तू घर क्यों नहीं बनाताहै ॥ ४२२ ॥”
एतच्छ्रुत्वा तां वानरः सकोपमाह,-“अधमे ! कस्मात् न त्वं मौनव्रता भवसि । अहो ! धार्ष्ट्यमस्याः अद्य मामुपहसति ।
यह सुन क्रोध कर वानर बोला,-“अधमे ! चुप क्यों नहीं होती, अहो ! इसकी ढीठता कि, मेरा उपहास करती है-
सूचीमुखी दुराचारा रण्डा पण्डितवादिनी ।
नाशङ्कते प्रजल्पन्ती त त्किमेनां न हन्म्यहम् ॥ ४२३ ॥”
सूचीमुखवाली दुराचार रण्डा वृथा अपनेको पंडित माननेवाली बकवाद करती हुई नहीं डरती । सो इसको मैं क्यों नहीं नष्ट करूं ॥ ४२३ ॥”
एवं प्रलप्य तामाह,-“मुग्धे ! किं तव ममोपरि चिन्तया । उक्तंच-
इस प्रकार जल्पना कर उससे बोला,-“मुग्धे ! मेरी चिन्तासे तुझे क्या, कहा है-
वाच्यं श्रद्धासमेतस्य पृच्छतश्च विशेषतः ।
प्रोक्तं श्रद्धाविहीनस्य अरण्यरुदितोपमम् ॥ ४२४ ॥
श्रद्धासे युक्त पूछते मनुष्यसेही विशेष कर कहना चाहिये श्रद्धाहीनसे कहना वनमें रोनेकी समान है ॥ ४२४ ॥
तत् किं बहुना । तावत् कुलायस्थितया तया पुनरपि अभिहितः स तावत् तां शमीमारुह्य तस्याः कुलायं शतधा खण्डश अकरोत् । अतोऽहं ब्रवीमि “उपदेशो न दातव्यः” इति।
सो बहुत कहनेसे क्या है जब कि, घोंसलेमें बैठी हुई उसने फिर कहा तब इसने शमी वृक्षपर चढकर उसके घोंसलेके सौ खण्डकर दिये । इससे मैं कहता हू कि, “जिस किसीको उपदेश न देना चाहिये”
तन्मूर्ख ! शिक्षापितोऽपि न शिक्षितः त्वम् । अथवा न ते दोषोऽस्ति, यतः साधोः शिक्षा गुणाय सम्पद्यते न असाधोः । उक्तञ्च-
( १८२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सो हे मूर्ख ! सिखाया हुआ भी तून सीखा । अथवा तेरा दोष नहीं है साधुमें शिक्षा गुणके निमित्त होतीहै असाधुमें नहीं । कहाहै-
किं करोत्येव पाण्डित्यमस्थाने विनियोजितम् ।
अन्धकारप्रतिच्छन्ने घटे दीप इवाहितः ॥ ४२५ ॥
अनुचित स्थानमें लगाई पंडिताई क्या कर सकतीहै जैसे अंधकारसे पूर्ण घडेके ऊपर धरा हुआ दीपक ( उसके भीतरका अंधकार दूर नहीं कर सकता ) ॥ ४२५ ॥
तद्व्यर्थपाण्डित्यमाश्रित्य मम वचनमशृण्वन् न आत्मनः शान्तिमपि वेत्सि, तन्नूनमपजातः त्वम् । उक्तञ्च-
सो वृथा पांडित्यका आश्रय कर मेरे वचन न सुने न अपनी शान्तिको भी जाना सो अवश्यही तू विजातीयहै । कहा है-
जातः पुत्रोऽनुजातश्च अतिजातस्तथैव च ।
अपजातश्च लोकेऽस्मिन्मन्तव्याः शास्त्रवेदिभिः ॥ ४२६ ॥
इस संसारमें शास्त्रके जाननेवाले जात, अनुजात, अतिजात और अपजात यह चार प्रकारके पुत्र कहते हैं ॥ ४२६ ॥
मातृतुल्यगुणो जातस्त्वनुजातः पितुः समः ।
अतिजातोऽधिकस्तस्मादपजातोऽधमाधमः ॥ ४२७ ॥
माताके तुल्य गुणवाला जात, पिताके तुल्य गुणवाला अनुजात, पितासे अधिक अतिजात और अपजात अधमाधम कहाता है ॥ ४२७ ॥
अप्यात्मनो विनाशं गणयति न खलः परव्यसनहृष्टः ।
प्रायो मस्तकनाशे समरमुखे नृत्यति कबन्धः ॥ ४२८ ॥
पराये दुःखसे प्रसन्न हुआ दुष्ट अपने नाशको नहीं गिनताहै प्रायः मस्तकके नाश होनेमेंभी कबन्ध समरमें नृत्य करता है॥ ४२८ ॥
अहो ! साधु चेदमुच्यते ।
अहो ! यह सत्य कहा है कि-
धर्म्मबुद्धिः कुबुद्धिश्च द्वावेतौ विदितौ मम ।
पुत्रेण व्यर्थपाण्डित्यात्पिता धूमेन घातितः ॥ ४२९ ॥
भाषाटीकासमेतम्। ( १८३ )
धर्मबुद्धि और कुबुद्धि इन दोनोंको मैने जाना पुत्रकी वृथा पडिताईसे पिता धूमसे घातित हुआ ॥ ४२९ ॥”
दमनक आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत- दमनक बोला,-“यह कैसी कथा है?” वह बोला-
कथा १९.
कस्मिंश्चिदधिष्ठाने धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे वसतः स्म। अथ कदाचित् पापबुद्धिना चिन्तितम्, अहं तावत् मूर्खो दारिद्योपेतश्च। तदेनं धर्म्मबुद्धिमादाय देशान्तरं गत्वा अस्य आश्रयेण अर्थोपार्जनं कृत्वा एनमपि वंचयित्वा सुखी भवामि। अथ अन्यस्मिन् अहनि पापबुद्धिः धर्म्मबुद्धिं प्राह--“भो मित्र ! वार्द्धकभावे किं तमात्मविचेष्टित स्मरसि। देशान्तरमदृष्ट्वा कां शिशुजनस्य वार्त्ता कथयिष्यसि। उक्तञ्च-
किसी एक स्थानमें धर्मबुद्धि और पापबुद्धि दो मित्र रहते थे । तब कदाचित् पापबुद्धिने विचार किया में मूर्ख और दरिद्र हू सो इस धर्मबुद्धिको लेकर देशान्तर जाकर इसके आश्रयसे धन उत्पन्नकर इसको भी वंचित कर सुखी हूगा फिर और एक दिन पापबुद्धि धर्मबुद्धिसे बोला-“भो मित्र ! वृद्धावस्थामें क्या अपनी चेष्टाको स्मरण करोगे देशान्तरको विना देखे बालकोंसे क्य वार्ता कहेगा । कहा है-
देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम् । भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम् ॥ ४३० ॥
जिसने देशान्तरोंमे बहुत भाषावेषादि नहीं जाना है पृथवीतलमे घूमते हुए उसका जन्म वृथा गया ॥ ४३० ॥
तथाच- तैसेही-
विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक् । यावद्व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः ॥ ४३१ ॥”
( १८४ ) - पञ्चतन्त्रम् ।
विद्याँ धन कारीगरी तवतक मनुष्य अच्छी तरह प्राप्त नहीं करता है जब-तक प्रसन्न हुआ देश देशान्तरकी भूमिमें नहीं जाता है ॥ ४३१ ॥"
अथ तस्य तद्वचनमाकर्ण्य प्रहृष्टमनाः तेनैव सह गुरुजनानुज्ञातः शुभे ऽहनि देशान्तरं प्रस्थितः । तत्र च धर्म्मबुद्धिप्रभावेण भ्रमता पापबुद्धिना प्रभूततरं वित्तमासादितम्। ततश्च द्वावपि तौ प्रभूतोपार्जितद्रव्यौ प्रहृष्टौ स्वगृहं प्रति औत्सुक्येन निवृत्तौ । उक्तञ्च–
तब उसके इस वचनको सुनकर उसीके संग गुरुजनोंकी आज्ञा लेकर सुन्दर दिनमें देशान्तरको गया वहां धर्मबुद्धिके प्रभावसे भ्रमते हुए पापबुद्धिने बहुतसा धन प्राप्त किया । तब दोनोंही बहुत धनके उपार्जनसे प्रसन्न हुए अपने घरके प्रति उत्कंठासे निवृत्त हुए । कहा है–
प्राप्तविद्यार्थशिल्पानां देशान्तरनिवासिनाम् ।
क्रोशमात्रोऽपि भूभागः शतयोजनवद्भवेत् ॥ ४३२ ॥"
प्राप्तविद्या धन और कारीगरीवाले देशान्तरमें निवास करनेवालोंको एक कोशमात्र पृथ्वी सौयोजनकी समान होती है ( अर्थात् जब सिद्धकार्य हो निजस्थानमें आते हैं तब एक कोश सौ योजनसा बीतता है ) ॥ ४३२ ॥"
अथ स्वस्थानसमीपवर्त्तिना पापबुद्धिना धर्म्मबुद्धिरभिहितः,–"भद्र ! न सर्व्वमेतद्धनं गृहं प्रति नेतुं युज्यते, यतः कुटुम्बिनो बान्धवाश्च प्रार्थयिष्यन्ते । तदत्र एव वनगहने क्वापि भूमौ निक्षिप्य किंचिन्मात्रमादाय गृहं प्रविशावो भूयोऽपि प्रयोजने सञ्जाते तन्मात्रं समेत्य अस्मात् स्थानात् नेष्यावः । उक्तञ्च–
तब अपने स्थानके समीपवर्ती पापबुद्धिने धर्मबुद्धिसे कहा–"भद्र ! यह सब धन घर लेजाना उचित नहीं है क्यों कि, कुटुम्बि और बन्धु उसकी प्रार्थना करेंगे । सो इसी वनगहनमें कहीं पृथ्वीमें गाड़कर उसमेंसे कुछ लेकर घरको जांय, कि, फिरभी प्रयोजन होनेपर उतनाही परस्पर मिलकर इस स्थानसे लेजायेंगे । कहा है–
न वित्तं दर्शयेत्प्राज्ञः कस्यचित्स्वल्पमप्यहो ।
मुनेरपि यतस्तस्य दर्शनाच्चलते मनः ॥ ४३३ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १८५ )
बुद्धिमान् अपना थोड़ा धनभी किसीको न दिखावे कारण कि, उसके दर्शनसे मुनिकाभी मन चलायमान होजाता है ॥ १४३ ॥
तथाच— तथाहि—
यथामिषं जले मत्स्यैर्भक्ष्यते श्वापदैर्भुवि ।
आकाशे पक्षिभिश्चैव तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥ १४४ ॥
जैसे मांस जलमें मच्छोंसे, पृथ्विमें सिंहादि हिंसकोंसे, आकाशमें पक्षियोंसे खाया जाता है इसी प्रकार सर्वत्र धनवान् खाया जाता है ॥ १४४ ॥
तदाकर्ण्य धर्मबुद्धिः प्राह,—"भद्र ! एवं क्रियताम्" । तथा अनुष्ठिते द्वावपि तौ स्वगृहं गत्वा सुखेन संस्थितवन्तौ । अथ अन्यस्मिन्नहनि पापबुद्धिर्निशीथेऽटव्यां गत्वा तत् सर्वं वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं जगाम । अथ अन्येद्युः धर्मबुद्धिं समभ्येत्य प्रोवाच,—"सखे ! बहुकुटुम्बा वयं वित्ताभावात् सीदामः । तद्गत्वा तत्र स्थाने किंचिन्मात्रं धनमानयावः" । सोऽब्रवीत्,—"भद्र ! एवं क्रियताम्" । अथ द्वावपि गत्वा तत् स्थानं यावत् खनतस्तावत् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ । अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् प्रोवाच—"भो धर्मबुद्धे ! त्वया हृतमेतद्धनं न अन्येन, यतो भूयोऽपि गर्त्तापूरणं कृतं, तत् प्रयच्छ मे तस्यार्द्धं, अथवा अहं राजकुले निवेदयिष्यामि" । स आह,—"भो दुरात्मन् ! मैवं वद, धर्मबुद्धिः खलु अहम् । न एतच्चौरकर्म करोमि । उक्तञ्च—
यह सुनकर धर्मबुद्धि कहने लगा,—"भद्र ! ऐसाही करो" ऐसा अनुष्ठान करनेपर वे दोनोंही अपने घर जाकर सुखसे स्थित हुए । तब किसी और दिन पापबुद्धि अर्धरात्रमें जाकर उस सब धनको ले गड्ढेको पूर्ण कर अपने घर आया । फिर दूसरे दिन धर्मबुद्धिसे मिलकर बोला,—"सखे ! हम बहुत कुटुम्बी हैं इस कारण धनके अभावसे दुःखी होते हैं । सो चलकर उस स्थानसे कुछ धन लावें" । वह बोला,—"भद्र ! ऐसाही करो" । तब दोनोंही जाकर जब उस स्थानको खोदने लगे तब वहां बर्तन रीता देखा । तब वह पापबुद्धि
( १८६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
शिरपीटता हुआ बोला,—“भो धर्मबुद्धे ! तेनेही यह मेराँ धन हरलिया है किसी औरने नहीं । जो फिरभी गड्डा भरदिया सो उसका आधा मुझे दे नहीं तो मैं राजकुलमें निवेदन करूंगा” । वह बोला,—“भो दुरात्मन् ! ऐसा मत कह । निश्चयही मैं धर्मबुद्धि हूं यह चोर कर्म नहीं करता हूं । कहाहै—
मातृवत्परदाराणि परद्रव्याणि लोष्ठवत् । आत्मवत्सर्वभूतानि वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः ॥ ४३५ ॥"
माताकी समान पराई स्त्री, मट्टीकी समान पराया धन, आत्माकी समान सब प्राणियोंको धर्मबुद्धि देखते हैं ॥ ४३५ ॥”
एवं द्वावपि तौ विवदमानौ धर्माधिकारिणं गतौ प्रो- चतुश्च परस्परं दूषयन्तौ । अथ धर्माधिकरणाधिष्ठित- पुरुषैः दिव्यार्थे यावत् नियोजितौ तावत् पापबुद्धिः आह,—“अहो ! न सम्यग्दृष्टोऽयं न्यायः । उक्तञ्च—
इस प्रकार वे दोनोंही झगडा करते हुए धर्माधिकारीके पास जाकर बोलते हुए परस्पर दूषण देनेलगे । तब धर्माधिकारीसे नियुक्त हुए पुरुषोंने ज्यों ही शपथके निमित्त उसको नियुक्त किया, तबतक पापबुद्धि बोला,—“आश्चर्य है कि, भलीप्रकार न्याय नहीं हुआ । कहा है—
विवादेऽन्विष्यते पत्रं तदभावेऽपि साक्षिणः । साक्ष्यभावात्ततो दिव्यं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ४३६ ॥
विवादमें पहले पत्र (लेख) देखा जाता है, उसके अभावमें साक्षी, साक्षीके अभावमें शपथ करनी ऐसा बुद्धिमानोंने कहा है ॥ ४३६ ॥
तदत्र विषये मम वृक्षदेवताः साक्षिभूताः तिष्ठंति । ता अपि आवयोः एकतरं चौरं साधुं वा करिष्यन्ति” । अथ तैः सर्वैः अभिहितम्—“भोः ! युक्तमुक्तं भवता । उक्तञ्च—
सो इस विषयमें वृक्षदेवता हमारे साक्षी हैं वही हम दोनोंमें एकको चोर या साधु करेंगे” तब उन सबने कहा—“भो ! आपने सत्य कहा । कहा है—
अन्त्यजोऽपि यदा साक्षी विवादे सम्प्रजायते । न तत्र विद्यते दिव्यं किं पुनर्यत्र देवताः ॥ ४३७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १७७ )
जब विवादमें अन्यजभी साक्षी होता है वहां शपथ नहीं लीजाती फिर जहां देवता हों वहां शपथ कैसी ॥ ४३७ ॥
तदस्माकमपि अत्र विषये महत्कौतूहलं वर्त्तते । प्रत्यूषसमये युवाभ्यामपि अस्माभिः सह तत्र वनोद्देशे गन्तव्यम्” इति । एतस्मिन्नन्तरे पापबुद्धिः स्वगृहं गत्वा स्वजनकमूवाच—“तात ! प्रभूतोऽयं मयार्थो धर्म्मबुद्धेश्चोरितः, स च तव वचनेन परिणतिं गच्छति, अन्यथा अस्माकं प्राणैः सह यास्यति” । स आह—“वत्स ! द्रुतं वद् येन प्रोच्य तद्द्रव्यं स्थिरतां नयामि” पापबुद्धिः आह—“तात ! अस्ति तत्प्रदेशे महाशमी, तस्यां महत्कोटरमस्ति, तत्र त्वं साम्प्रतमेव प्रविश । ततः प्रभाते यदाहं सत्यश्रावणं करोमि, तदा त्वया वाच्यं यद्धर्म्मबुद्धिश्चौरः” इति । तथा अनुष्ठिते प्रत्यूषे स्नात्वा पापबुद्धिः धर्म्मबुद्धिपुरःसरो धर्म्माधिकरणिकैः सह तां शमीमभ्येत्य तारस्वरेण प्रोवाच–
सो हमकोभी इस विषयमें बडा कुतूहल है प्रातःकाल तुम दोनोंको हमारे साथ उस वनमें जाना चाहिये”। इसी समय पापबुद्धि अपने घर जाय पितासे बोला-“हे तात ! बहुतसा यह धर्मबुद्धिका धन मैंने चुरा लिया वह तुम्हारे वचनसे पचजायगा । नहीं तो मेरे प्राणोंके साथ जायगा”। वह बोला—“वत्स ! शीघ्र कहो जिसे कहकर मैं उस द्रव्यको स्थिरताको प्राप्तकरूं” । पापबुद्धि बोला--“तात ! इस प्रदेशमें एक महा शमीका पेड है उसकी एक बडी खखोडल है वहां तू अभी प्रवेश करजा, प्रातःकाल जब मैं सत्य सुनाऊ तत्र तुम कह देना धर्मबुद्धि चोर है,” ऐसा कर प्रभात स्नान कर पापबुद्धि धर्मबुद्धिको आगे किये धर्माधिकारियोंके संग उस शमीको प्राप्तहो ऊंचे स्वरसे बोला–
“आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम् ॥ ४३८ ॥
( १६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
“सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, स्वर्ग, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिनरात्रि, दोनों संध्या और धर्म मनुष्यके कर्तव्यको जानता है ॥ ४३८ ॥
भगवति वनदेवते ! आवयोर्मध्ये यः चौरः त्वं कथय” . अथ पापबुद्धिपिता शमीकोटरस्थः प्रोवाच—“भोः ! शृणुत शृणुत धर्मबुद्धिना हतमेतद्धनम्” । तदाकर्ण्य सर्वे ते राजपुरुषा विस्मयोत्फुल्ललोचना यावद्धर्मबुद्धेः वित्तहरणोचितं निग्रहं शास्त्रदृष्ट्या अवलोकयन्ति तावद्धर्मबुद्धिना तच्छमीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना सन्दीपितम् । अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरेऽर्द्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः करुणं परिदेवयन् पापबुद्धिपिता निष्क्राम । ततश्च तैः सर्वैः पृष्टः—“भोः ! किमिदम् ?” इत्युक्ते स पापबुद्धिविचेष्टितं सर्वमिदं निवेदयित्वा उपरतः । अथ ते राजपुरुषाः पापबुद्धिं शमीशाखायां प्रलम्ब्य धर्मबुद्धिं प्रशस्य इदमूचुः—“अहो ! साधु चेदमुच्यते—
भगवति वनदेवते ! हम दोनोंके बीचमें जो चोरहो उसको तुम कहो” तत्र पापबुद्धिका पिता शमीकी खखोडलमेंसे बोला--“भो ! सुनो २ यह धन धर्मबुद्धिने हरण किया है” यह सुनकर वे सब राजपुरुष विस्मयसे खिले नेत्रवाले जबतक धर्मबुद्धिको धनहरणके उचित दंडको शास्त्रदृष्टिसे देखते हैं तबतक धर्मबुद्धिने उस शमीकी खखोडल अग्निभोज्य ( तृणादि ) द्रव्यसे ढककर उसमें आग लगादी । तब उस शमीकोटरके जलनेपर अर्ध दग्धशरीरवाला नेत्रफूटा करुणास्वरसे चिल्लाता हुआ पापबुद्धिका पिता निकला. तब उन सबने पूछा--“भोः ! यह क्या है ?” । ऐसा कहनेपर वह इस सब पापबुद्धिकी चेष्टाको निवेदन कर मरगया । तब वे राजपुरुष पापबुद्धिको शमीशाखामें बांधकर धर्मबुद्धिकी प्रशंसा कर यह बोले--“अहो ! यह सत्य कहा है—
उपायं चिन्तयेत्प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् । पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलेन हता बकाः ॥ ४३९ ॥”
बुद्धिमान् उपायकी चिन्ता कर अपायकीभी चिन्ता करे। मूर्ख बगलेके देखते नौलेने उसके बच्चे खालिये ॥ ४३९ ॥”
भाषाटीकासमेतम् । ( १८९ )
धर्म्मबुद्धिः प्राह- "कथमेतत् ?" ते प्रोचुः ।
धर्मबुद्धि बोला-"यह कैसे ?" वे बोले-
कथा २०.
अस्ति कस्मिंश्चिद्वनोद्देशे बहुवकसनाथो वटपादपः । तस्य कोटरे कृष्णसर्पः प्रतिवसति स्म । स च बकबालकानजातपक्षान् अपि सदैव भक्षयन् कालं नयति । अथ एको बकस्तेन भक्षितानि अपत्यानि दृष्ट्वा शिशुवैराग्यात् सरस्तीरमासाद्य बाष्पपूरपूरितनयनः अधोमुखस्तिष्ठति । तञ्च तादृक्चेष्टितमवलोक्य कुलीरकः प्रोवाच,- "माम ! किमेवं रुद्यते भवता अद्य?" । स आह-"भद्र ! किं करोमि, मम मन्दभाग्यस्य बालकाः कोटरनिवासिना सर्पेण भक्षिताः, तद्दुःखदुःखितोऽहं रोदिमि । तत् कथय मे यदि अस्ति कश्चिदुपायः तद्विनाशाय ?" । तदाकर्ण्य कुलीरकः चिन्तयामास । "अयं तावत् अस्मज्जातिसहजवैरी तथा उपदेशं प्रयच्छामि सत्यानृतं यथान्येऽपि बकाः सर्वे संक्षयमायान्ति । उक्तञ्च-
किसी एक वनमें बहुत बगलोंसे युक्त वटका वृक्ष था उसकी खखोड्लमें काला सांप रहताथा । वह पख न निकले बगलेके बच्चोंको सदा भक्षण करता समय बिताता । तब एक बगला उसके भक्षण किये सन्तानोंको देखकर बालकोंके विरागसे नदीके किनारे आकर नेत्रोंमें जलभरे नीचेको मुख किये स्थित था । उसकी यह चेष्टा देखकर कुलीरक बोला-"मामा ! आज तुम क्यों रोतेहो ?" । वह बोला,-"भद्र ! क्या करू मुझ मन्दभाग्यके बालक खखोड्लमें रहनेवाले काले सर्पने खालिये । उसके दुःखसे दुःखी हुआ मैं रोताहू सो मुझसे कह यदि कोई उस सापके नाशका उपाय हो तो ?" यह सुनकर कुलीरक चिन्ता करने लगा । "यह तो हमारी जातिका सहज वैरी है ऐसा उपदेश दू कि, सत्य और अनृत हो जिससे सब बगले नाश हो जायेंगे । कहाहै-
नवनीतसमां वाणीं कृत्वा चित्तं तु निर्दयम् ।
तथा प्रबोध्यते शत्रुः सान्वयो म्रियते यथा ॥ ४४० ॥"
( १९० ) पञ्चतन्त्रम् ।
मक्खनकी समान वाणी और निर्दय चित्त करके शत्रुको इस प्रकार समझावे जिससे वंशसहित शत्रु मरजाय ॥ ४४० ॥
आह च,—“माम ! यदि एवं तत् मत्स्यमांसखण्डानि नकुलस्य बिलद्वारात् सर्पकोटरं यावत् प्रक्षिप यथा नकुलस्तन्मार्गेण गत्वा तं दुष्टसर्पं विनाशयति”। अथ तथा अनुष्ठिते मत्स्यमांसानुसारिणा नकुलेन तं कृष्णसर्पं निहत्य तेऽपि तद्वृक्षाश्रयाः सर्वे बकाश्च शनैः शनैर्भक्षिताः। अतो वयं ब्रूमः “उपायं चिन्तयेदिति” ।
बोलाभी—“मामा ! यदि ऐसा है तो मत्स्योंके मांसखण्ड नकुलके बिलके द्वारसे सांपकी खखोडळपर्यन्त डालो जो नौला उसमार्गसे जाकर उस दुष्ट सर्पको मारेगा” वैसा अनुष्ठान करनेपर मछलियोंके मांसानुसारी नौलेने उस काले सर्पको मारकर और वेभी उस वृक्षपर रहनेवाले सब बगले भी शनैः २ भक्षण कर लिये । इससे हम कहते हैं “उपाय विचारे इत्यादि” ।
तदनेन पापबुद्धिना उपायश्चिन्तितो नापायः । ततस्तत्फलं प्राप्तम् ।
सो इस पापबुद्धिने उपाय विचारा अपाय नहीं सो इसका यह फल है ।
धर्मबुद्धिः कुबुद्धिश्च द्वावेतौ विदितौ मम । पुत्रेण व्यर्थपाण्डित्यात्पिता धूमेन घातितः ॥ ४४१ ॥
धर्मबुद्धि और कुबुद्धि यह दोनों मैने जाने, वृथा पाण्डित्यसे पिताको धूमसे पुत्रने मारडाला ॥ ४४१ ॥
एवं मूढ ! त्वयापि उपायश्चिन्तितो नापायः पापबुद्धिवत् । तत् न भवसि त्वं सज्जनः, केवलं पापबुद्धिरसि, ज्ञातो मया स्वामिनः प्राणसन्देहानयनात् । प्रकटीकृतं त्वया स्वयमेवात्मनो दुष्टत्वं कौटिल्यञ्च । अथवा साधु चेदमुच्यते—
सो हे मूढ ! तैनेभी उपायकी चिन्ता करी अपायकी नहीं । सो तू सज्जन नहीं केवल पापबुद्धि है जाना मैने स्वामीके प्राणसन्देहकी अनयसे प्रगट की या तुमने स्वयंही अपनी दुष्टता और कुटिलता । अथवा अच्छा कहा है—