भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( १७९ )

समाहत हुआ किसी प्रकार शान्त न हुआ । तब कोई वानर अग्निकणकी समान चोंटलियोंको इकट्ठाकर अग्निकी इच्छासे फूंक मारते हुए चारों ओरसे स्थित हुए । तब सूचीमुख नाम पक्षी उनके उस वृथा परिश्रमको देखकर बोला— "भोः ! तुम सब मूर्ख हो । यह अग्निकण नहीं हैं, यह चोंटलीहैं क्यों वृथा परिश्रम करतेहो । इससे शीत रक्षा न होगी, सो ढूँढो कोई पवनरहित वन-स्थान गुहा वा पर्वतकदरं अबभी मडल बाधे हुए मेघ दीखते हैं" । तब उन-मेसे एक बूढा वानर उससे बोला—"भो मूर्ख ! तुझे इससे क्या प्रयोजन है चलाजा । कहाहै—

मुहुर्विघ्नितकर्माणं द्यूतकारं पराजितम् ।
नालापयेद्विवेकज्ञो यदीच्छेत्सिद्धिमात्मनः ॥ ४१८ ॥

वारंवार कर्ममें विघ्न पानेवाला, जुआ खेलनेवाला, पराजित इनसे यदि अपने मगलकी इच्छा हो तो वार्ता न करे ॥ ४१८ ॥

तथाच—
तैसेही—

आखेटकं वृथा क्लेशं मूर्खं व्यसनसंस्थितम् ।
आलापयति यो मूढः स गच्छति पराभवम् ॥ ४१९ ॥"

शिकारी, वृथा क्लेशकारी, मूर्ख, दुर्व्यसनमें स्थितसे जो वार्ता करता है वह पराभवको प्राप्त होता है ॥ ४१९ ॥"

सोऽपि तमनादृत्य भूयोऽपि वानराननवरतमाह—
"भोः ! किं वृथा क्लेशेन" अथ यावदसौ न कथंचित् प्रलपन्विरमति तावदेकेन वानरेण व्यर्थश्रमत्वात् कुपितेन पक्षाभ्यां गृहीत्वा शिलायामास्फालित उपर- तश्चातोऽहं ब्रवीमि, "नानाम्यं नमते दारु" इत्यादि।

वह भी उसको अनादर कर बारंबार बानरोसे वही वचन कहने लगा— "भो ! वृथाक्लेशसे क्या है" । सो जब यह किसी प्रकार प्रलापसे न शान्त हुआ तब एक वृथा श्रमसे क्रुद्ध हुए वानरने उसके पक्ष पकड कर शिलापर पट- ककर मार दिया, इससे मैं कहता हू "अनमित काष्ठ नहीं नमता इत्यादि" ।