भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( १८० ) पञ्चतन्त्रम् ।

तथाच-
तैसेही-

उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्तये ।
पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवर्द्धनम् ॥ ४२० ॥

मूर्खोंको उपदेश करना कोपके वास्ते है शान्तिको नहीं सर्पोंको दूध पिलाना केवल विष बढानेके निमित्त है ॥ ४२० ॥

अन्यच्च-
औरभी-

उपदेशो न दातव्यो यादृशे तादृशे जने ।
पश्य वानरमूर्खेण सुगृही निर्गृहीकृतः ॥ ४२१ ॥"

जैसे तैसे मनुष्यको उपदेश देना न चाहिये देखो एक मूर्ख वानरने उत्तम गृहस्थ घरसे शून्य कर दिया ॥ ४२१ ॥"

दमनक आह-"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत् ।
दमनक बोला-"यह कैसे ?" वह बोला-

कथा १८.

अस्ति कस्मिंश्चित् वनोद्देशे शमीवृक्षः । तस्य लम्बमानशिखायां कृतावासौ अरण्यचटकदम्पती वसतः स्म । अथ कदाचित् तयोः सुखसंस्थयोर्हैमन्तमेघो मन्दं मन्दं वर्षितुमारब्धः । अत्रान्तरे कश्चित् शाखामृगो वातासारसमाहतः प्रोद्गलितशरीरो दण्डवीणां वादयन् वेपमानः तत शमीमूलमासाद्य उपविष्टः । अथ तं तादृशमवलोक्य चटका प्राह-"भो भद्र !

किसी एक वनके स्थानमें शमीका पेड था । उसकी लम्बमान शिखामें निवास करनेवाले बनेले चटक चटका रहतेथे । एक समय सुखसे बैठे हुए उन दोनोंके हेमन्त कालका मेघ मन्द २ वर्षने लगा । इसी समय कोई शाखामृग ( वानर ) पवन वर्षासे हत हुआ वर्षाके जलसे भीजा शरीरवाला दंडवीणाको बजाता हुआ कंपित हुआ, उस शेमलके नीचे आकर बैठा उसकी यह दशा देख चटका बोली,-"भो भद्र !