भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

( १९४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

तब यह वणिक्शिशु स्नानकी सामग्री लेकर प्रसन्नहो उस अभ्यागतके साथ चला । तब यह वणिक् ऐसा करनेपर स्नान कर उस बालकको नदीगुहामें रख उसके द्वारको एक बडी शिलासे ढककर बहुत शीघ्र घर आया तब उस वैश्यने पूछा-“भो अभ्यागत ! कहो कहां है वह मेरा बालक जो तेरे साथ नदीस्ना-नको गयाथा” वह बोला-“नदीके किनारेसे उसको गिद्ध लेगया” । सेठ बोला,-“मिथ्या वादिन् ! क्या कोई गिद्धभी बालकको हरण कर सकता है । सो मेरे पुत्रको दे नहीं तो राजकुलमें निवेदन करूंगा,” वह बोला,-“भो सत्यवादिन् ! जैसे गिद्ध बालकको नहीं लेजा सकता इसी प्रकार मूषकभी लोहसे बनी तराजूको नहीं खा सकते हैं । मेरी तराजू दे यदि बालकसे प्रयोजन है तो” । इस प्रकार दोनोंही विवाद करते राजकुलमें गये । वहां सेठ ऊंचे स्वरसे बोला “भो ! बडा अनुचित है ! बडा अनुचित है ! मेरा बालक इस चोरने हरण कर लिया,” तब धर्माधिकारी उससे बोले,-“श्रेष्ठिका पुत्र समर्पण करो”। वह बोला,-“मैं क्या करूं मेरे देखते नदीतटसे गृध्रने बालक हरण किया,” यह सुनकर वह बोले,-“भो ! तुमने सत्य नहीं कहा क्या गिद्ध बालक हरण करनेको समर्थ हो सकता है ?” वह बोला,-“भो ! भो ! ! हमारे वचन सुनो-

तुलां लोहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषिकाः । राजन् तत्र हरेच्छ्येनो बालकं नात्र संशयः ॥ ४४८ ॥’

जहां सहस्र लोहकी तराजूको मूषे खा जाते हैं वहां बालककोभी श्येन हर लेता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ४४८ ॥”

ते प्रोचुः-“कथमेतत् ?” ततः श्रेष्ठी सभ्यानामग्रे आदितः सर्वं वृत्तान्तं निवेदयामास । ततः तैर्विहस्य द्वावपि तौ परस्परं संबोध्य तुलाशिशुप्रदानेन सन्तोषिताौ । अतोऽहं ब्रवीमि, “तुलां लोहसहस्रस्य” इति ।

वह बोले,-“यह कैसे ?” तब श्रेष्ठी सभ्योंके आगे आदिसे सब वृत्तान्त निवेदन करता भया, तब उन्होंने हँसकर उन दोनोंहीको तराजू और बालक दिलवाकर सन्तुष्ट किया, इससे मैं कहताहूं ‘तुला लोहसहस्रकी इत्यादि’ ॥

तन्मूर्ख ! सञ्जीवकप्रसादमसहमानेन त्वया एतत् कृतम् । अहो साधु चेदमुच्यते-