भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

( १९८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

ततोऽहं पूर्वमेवात्मानमरत्नं समर्प्य एतान् मुञ्चामि । उक्तञ्च-

उसके सेवा करनेपर उन ब्राह्मणोंने सब वस्तु बेचकर बहु मूल्य रत्न खरीदे । और उनको जंघामें उनके सन्मुखही डालकर अपने देश जानेको तयार हुए । तब वह ब्राह्मण उनको जाता देख मनमें व्याकुल हुआ, "अहो यह धन कुछभी हमको न दिया सो मैं इनके साथ जाऊं मार्गमे कहीं विष दे इनको मारकर सब रत्न ग्रहण करूं" । ऐसा विचार कर उनके आगे करुणासे विलाप कर यह बोला,-"भो मित्रो ! तुम मुझ इकलेको छोडकर जानेको तयार हुए, सो मेरा मन आपके साथ स्नेहपाशमें बंधा है आपके वियोगसेही मैं व्याकुल हूं बुद्धि धीरज धारण नहीं करती है । तुम अनुग्रह कर सहायभूत मुझेभी साथ ले चलो" । उसकेवचन सुन वे करुणासे आर्द्रचित्त हो उसके साथ ही अपने देशको चले । तब मार्गमें उन पांचोंके पल्लीपुरमें जाते हुए काक कहने लगे,-"रेरे किरातो ! दौडो दौडो सत्रा लाख रुपयेके धनी जाते है इनको मारकर धन लेलो" । तब किरांतोंने ध्वांक्षवचन सुनकर शीघ्र जाकर उन ब्राह्मणोंको लगुडप्रहारसे जर्जर करके वस्त्र उतारकर देखा, परन्तु धन कुछभी न पाया । तब उन किरातोंने कहा,-"भो मुसाफिरो ! पहले कभी काकोंका वचन असत्य नहीं हुआथा । सो तुम्हारे पास कहीं धन है सो दो नहीं तो सबका वधकर चर्म विदीर्ण कर प्रत्यंग देखकर धन लेलेगे" । तब उनके ऐसे वचन सुनकर चोर विप्रने मनमें विचारा "जो यह इन ब्राह्मणोंका वध कर अंगको देख रत्न लेंगे तो मुझकोभी मारेंगे सो पहले मैं अरत्न अपनेको समर्पण कर इनको छुडाऊं । कहा है-

मृत्योर्बिभेषि किं बाल न स भीतं विमुञ्चति । अद्य वाब्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुवः ॥ ४५३ ॥

मूर्ख ! मृत्युसे क्यों डरता है यह डरे हुएको नहीं छोडेगी आज वा सौ वर्षमें प्राणियोंको मृत्यु अवश्य होगी ॥ ४५३ ॥

तथाच-

तैसेही-

गवार्थे ब्राह्मणार्थे च प्राणत्यागं करोति यः । सूर्य्यस्य मण्डलं भित्त्वा स याति परमां गतिम् ॥४५४॥