पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १९९ )
जो गौ और ब्राह्मणके निमित्त प्राणत्याग करता है वह सूर्यमण्डलको भेदकर परमगतिको जाता है ॥ ४१४ ॥”
इति निश्चित्य अभिहितम्,—“भोः किराताः ! यदि एवं ततो मां पूर्वं निहत्य विलोकयत । ततः तैस्तथानुष्ठिते तं धनरहितमवलोक्य अपरे चत्वारोऽपि मुक्ताः । अतोऽहं ब्रवीमि, “पण्डितोऽपि वरं शत्रुः” इति । अथ एवं संवदतोस्तयोः सञ्जीवकः क्षणमेकं पिंगलकेन सह युद्धं कृत्वा तस्य खरनखरप्रहाराभिहतो गतासुः वसुन्धरापीठे निपपात । अथ तं गतासुमवलोक्य पिंगलकस्तद्गुणस्मरणाद्र्द्रहृदयः प्रोवाच- “भोः ! अयुक्तं मया पापेन कृतं सञ्जीवकं व्यापादयता, यतो विश्वासघातादन्यत् नास्ति पापतरं कर्म । उक्तञ्च—
ऐसा निश्चय कर उसने कहा,—“हे किरातो ! जो ऐसा है तो पहले मुझे मारकर देखो तब उन्होंने वैसा करके उसको धनरहित देख शेष चारों छोड़ दिये । इससे मैं कहताहू “पंडितभी शत्रु अच्छा है इत्यादि” । ऐसा उन दोनोंके कहतेमैं सजीवक एकक्षण पिंगलकके साथ युद्ध करके उसके तीक्ष्ण नखप्रहारसे हत हुआ प्राणरहित हो पृथ्वीपर गिरा । तब उसको प्राणरहित देख पिंगलक उसके गुण स्मरणसे आर्द्रहृदय हो बोला,—“भो ! सजीवकको मारकर मैंने अयुक्त पाप किया, कारण कि,विश्वासघातसे अधिक और कोई पापकर्म नहीं है। कहाहै—
मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यश्च विश्वासघातकः ।
ते नरा नरकं यान्ति यावच्चन्द्रादिवाकरौ ॥ ४१५ ॥
मित्रद्रोही, कृतघ्नी और जो विश्वासघाती है वे मनुष्य जबतक सूर्य चन्द्र हैं तब तक नरकको जाते हैं ॥ ४१५ ॥
भूमिक्षये राजविनाश एव भृत्यस्य वा बुद्धिमतो विनाशे ।
नो युक्तमुक्तं ह्यनयोःसमत्वं नष्टापि भूमिःसुलभा न भृत्याः॥
भूमिक्षय राजनाश वा बुद्धिमान् भृत्यके नाशमें इनका समत्व कहना युक्त नहीं हो सक्ता नष्टहुई भूमि सुलभ है पर भृत्य नहीं मिलते ॥ ४१६ ॥
तथा मया सभामध्ये स सदैव प्रशंसितः । तत् किं कथयिष्यामि तेषामग्रतः । उक्तञ्च—