भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

(२००) पञ्चतन्त्रम् ।

और मैंने उसकी सभामे सदा प्रशंसा की अब उन सबके आगे क्या कहूंगा।- कहाहै-

उक्तो भवति यः पूर्वं गुणवानिति संसदि । न तस्य दोषो वक्तव्यः प्रतिज्ञाभङ्गभीरुणा ॥ ४५७ ॥”

जिसको पहले सभामें यह गुणवान् है ऐसा कहा है प्रतिज्ञाभंगभीरुओंको फिर उनके दोष कहने उचित नहीं हैं ॥ ४५७ ॥ ”

एवंविधं प्रलपन्तं दमनकः समेत्य सहर्षमिदमाह-“देव कातरतमस्तव एष न्यायो यद्द्रोहकारिणं शष्पभुजं हत्वा इत्थं शोचसि। तन्न एतदुपपन्नं भूभुजाम् । उक्तञ्च-

इस प्रकारसे प्रलाप करते हुएके निकट दमनक आकर प्रसन्नतासे यह बोला- “देव ! आपका यह न्याय अत्यन्त कातरतम है जो इस द्रोहकारी घासभोजीको मारकर इस प्रकार शोच करते हो राजाओंको यह उचित नहीं है । कहा है-

पिता वा यदि वा भ्राता पुत्रो भार्य्याथवा सुहृत् । प्राणद्रोहं यदा गच्छेद्वन्तव्यो नास्ति पातकम् ॥ ४५८ ॥

पिता, भ्राता, पुत्र, स्त्री वा सुहृत् जो यह अपने प्राणोंका द्रोह करें तो इनके मारनेमें पातक नहीं है ॥ ४५८ ॥

तथाच-
और देखो-

राजा घृणी ब्राह्मणः सर्वभक्षी स्त्री चात्रपा दुष्टमतिःसहायः। प्रेष्यःप्रतीपोऽधिकृतः प्रमादी त्याज्या अमी यश्च कृतं न वेत्ति॥

अति दयालु राजा, सर्वभक्षी ब्राह्मण, निर्लज्ज स्त्री, दुष्टमति सहायकारी, प्रतिकूल भृत्य, असावधान अधिकारी और जो कार्यको नहीं जानता इनको त्यागना चाहिये ॥ ४५९ ॥

आपिच-
औरभी-

सत्यानृता च पुरुषा प्रियवादिनी च हिंस्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या ।