भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (२०१)

भूरिव्यया प्रचुरवित्तसमागमा च
वेश्याङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा ॥ ४६० ॥

सत्य, झूठ, कठोर, प्रियवादिनी, हिंसायुक़्त, दया, भय, कभी स्वार्थयुक्त, पुरस्कारवाली, बहुत व्यय, बहुत धनकी प्राप्तिवाली राजाओंकी नीति वेश्याकी समान अनेकरूपवाली होतीहै ॥ ४६० ॥

अपिच-
और भी-

अकृनोपद्रवः कश्चिन्महानपि न पूज्यते ।
पूजयन्ति नरा नागान्न तार्क्ष्यं नागघातिनम् ॥ ४६१ ॥

विना उपद्रवकरे कोई महान्‌भी पूजित नहीं होता है मनुष्य सर्पोंको पूजते हैं सर्पघाती गरुडको नहीं पूजते हैं ॥ ४६१ ॥

तथाच-
तैसेही-

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ४६२ ॥

नहीं सोचवालोंका सोच करतेहो, बुद्धिमानोंके वचनोंको बोलते हो पडितलोग जीते मरे किसीकाभी सोच नहीं करते ॥ ४६२ ॥

एवं तेन सम्बोधितः पिंगलकः सञ्जीवकशोकं त्यक्त्वा दमनकसाचिव्येन राज्यमकरोत् ॥
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रे मित्रभेदो नाम प्रथमं तन्त्रं समाप्तम् ।

इस प्रकार उससे समझाया हुआ पिंगलक सञ्जीवकके शोकको त्यागनकर दमनकको मन्त्री बनाय राज्य करता रहा ॥

इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रे कामेश्वरकृतपाठशालायाः मुख्याध्यापकपंडित-ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां मित्रभेदोनाम प्रथमं तन्त्रं समाप्तम् । शुभमस्तु ।

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