भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 221

( २०६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

तन्तवोऽप्यायता नित्यं तन्तवो बहुलाः समाः ।
बहून्बहुत्वादायासात्सहन्तीत्युपमा सताम् ॥ ८ ॥”

तन्तुभी नित्य विस्तीर्ण हैं और बहुतसे तुल्यरूप तन्तु बहुतसे परिश्रमोंको सहन कर लेते हैं, यही महात्माओंकी उपमा है ॥ ८ ॥”

तथानुष्ठिते लुब्धको जालमादाय आकाशे गच्छतां तेषां पृष्ठतो भूमिस्थोऽपि पर्य्यधावत । तत ऊर्द्धाननः श्लोक-मेनमपठत्-

वैसा करने पर वह लुब्धक जालको लेकर आकाशमें जाते हुए उनके पीछे पृथ्वीमें स्थित हुआभी धावमान हुआ। और ऊपरको मुखकर यह श्लोक पढ़ने लगा-

जालमादाय गच्छन्ति संहताः पक्षिणोऽप्यमी ।
यावच्च विवदिष्यन्ते पतिष्यन्ति न संशयः ॥ ९ ॥

मिले हुए यह पक्षी मेरे जालको लेकर उड़ते हैं और जब पतित होंगे तब सब मेरे वशमें हो जांयगे ॥ ९ ॥

लघुपतनकोऽपि प्राणयात्राक्रियां त्यक्त्वा किमत्र भविष्य-तीति कुतूहलात् तत्पृष्ठलग्नोऽनुसरति । अथ दृष्टेरगोचरतां गतान् विज्ञाय लुब्धको निराशः श्लोकमपठन् निवृत्तश्च ।

लघुपतनकभी आजीविकाको छोड़कर इसमें क्या होगा इस कुतूहलसे उसके पीछे लगा चला । तब उनके दृष्टिपथसे अतीत होनेपर उन्हें गया जानकर लुब्धक यह श्लोक पढता हुआ । निवृत्त हुआ-

न हि भवति यन्न भाव्यं भवति च भाव्यं प्रयत्नेन ।
करतलगतमपि नश्यति यस्य हि भवितव्यता नास्ति १०॥

“जो नहीं होनहार है यह नहीं होती जो होनहार है वह यत्नसे होतीही है जिसकी भावी ( होनहार ) नहीं है हाथमें स्थित हुआ भी वह पदार्थ नष्ट हो जाता है ॥ १० ॥

तथाच-
तैसेही-

पराङ्मुखे विधौ चेत्स्यात्कथञ्चिद्द्रविणोदयः ।
तत्सोऽन्यदपि संगृह्य याति शंखनिधिर्यथा ॥ ११ ॥