पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२०७)
विधि के पराङ्मुख होनेमें किस प्रकार धनका उदय हो सकता है वह औरकोभी ग्रहण कर शंखनिधि ( न छिपाई ) की समान नष्ट हो जातीहै ॥११॥
तदास्तां तावत् विहङ्गामिषलोभो यावत् कुटुम्बवर्त्तनोपायभूतं जालमपि मे नष्टम्” । चित्रग्रीवोऽपि लुब्धकमदर्शनीभूतं ज्ञात्वा तानुवाच—“भो ! निवृत्तः स दुरात्मा लुब्धकः । तत्सर्वैरपि स्वस्थैर्गम्यतां महिलारोप्यस्य प्रागुत्तरदिग्भागे तत्र मम सुहृत् हिरण्यको नाम मूषकः सर्वेषां पाशच्छेदं करिष्यति । उक्तञ्च–
पक्षियोंके मांसका लोभ तो अलग रहा कुटुम्बकी आजीविकाका उपायभूत मेरा जालभी नष्ट हुआ”। चित्रग्रीवभी लुब्धकको नेत्रोंसे अलक्षित देखकर उनसे बोला,—“भो ! वह दुरात्मा लुब्धक निवृत्त हुआ । सो सब स्वस्थ होकर महिलारोप्यके उत्तर दिशाकी ओर चलो वहां मेरा सुहृत् हिरण्यक नाम मूषकराज सबके पाश छेदन करेगा। कहाहै–
सर्वेषामेव मर्त्यानां व्यसने समुपस्थिते । वाङ्मात्रेणापि साहाय्यं मित्रादन्यो न सन्दधे ॥ १२ ॥”
सम्पूर्ण मनुष्योंको व्यसन उपस्थित होनेमे वाणीमात्रकीभी सहायताको मित्रके विना कौन कर सकता है ॥ १२ ॥”
एवं ते कपोताः चित्रग्रीवेण सम्बोधिताः महिलारोप्ये नगरे हिरण्यकबिलदुर्गं प्रापुः । हिरण्यकोऽपि सहस्रमुखबिलदुर्गं प्रविष्टः सन् अकुतोभयः सुखेन आस्ते, अथवा साधु इदमुच्यते ।
इस प्रकार चित्रग्रीवसे कहे हुए वे कबूतर महिलारोप्य नगरमें हिरण्यकके बिलदुर्गको प्राप्त हुए । हिरण्यक भी सहस्र मुखके बिलदुर्गमें प्रविष्ट हुआ निर्भय सुखसे रहताथा । अथवा अच्छा कहाहै कि–
अनागतं भयं दृष्ट्वा नीतिशास्त्रविशारदः । अवसन्मूषकस्तत्र कृत्वा शतमुखं बिलम् ॥ १३ ॥
वे आये हुए भयका देखनेवाला नीतिशास्त्रमें पंडित मूषिक सौ मुखका बिल बनाकर आनंदसे रहताथा ॥ ३ ॥