भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( २०८ ) पञ्चतन्त्रम्।

दंष्ट्राविरहितः सर्पो मदहीनो यथा गजः । सर्वेषां जायते वश्यो दुर्गहीनस्तथा नृपः ॥ १४ ॥

दाढसे रहित जैसे सर्प, मदसे हीन जैसे हाथी, इसी प्रकार दुर्गहीन राजा सबके वशीभूत हो जाताहै ॥ १४ ॥

तथाच-
तैसेही-

न गजानां सहस्रेण न च लक्षेण वाजिनाम् । तत्कर्म सिध्यते राज्ञां दुर्गेणैकेन यद्रणे ॥ १५ ॥

न सहस्र हाथियोंसे न लाख घोडोंसे वह कार्य सिद्ध होता है जो युद्धमें एक किलेसे सिद्ध होताहै ॥ १५ ॥

शतमेकोऽपि सन्धत्ते प्राकारस्थो धनुर्धरः । तस्माद्दुर्गं प्रशंसन्ति नीतिशास्त्रविदो जनाः ॥ १६ ॥”

किलेमें स्थित धनुषधारी एकही सौसे युद्धकर सकता है इस कारण नीतिशास्त्रके ज्ञाता दुर्गकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥”

अथ चित्रग्रीवो बिलमासाद्य तारस्वरेण प्रोवाच-“भो भो मित्र हिरण्यक ! सत्वरमागच्छ । महती मे व्यसनावस्था वर्त्तते”। तच्छ्रुत्वा हिरण्यकोऽपि बिलदुर्गान्तर्गतः सन् प्रोवाच,-“भोः ! को भवान् ? किमर्थमायातः ? किं कारणम् ? कीदृक् ते व्यसनावस्थानम् ? तत् कथ्यताम्” इति । तच्छ्रुत्वा चित्रग्रीव आह-“भोः ! चित्रग्रीवो नाम कपोतराजोऽहं ते सुहृत् । तत् सत्वरमागच्छ गुरुतरं प्रयोजनमस्ति” । तत आकर्ण्य पुलकिततनुः प्रहृष्टात्मा स्थिरमनाः त्वरमाणो निष्क्रान्तः। अथवा साधु इदमुच्यते-

तब चित्रग्रीव बिलके निकट जाय ऊंचे स्वरसे बोला,-“भो भो मित्र हिरण्यक ! शीघ्रआओ मुझे बडी कष्टकी अवस्था वर्तमान है”। यह सुनकर हिरण्यकभी बिलदुर्गमें प्राप्त हुआ ही बोला,-“भो आप कौन हो ? क्यों आये हो ? क्या कारण है ? कैसी तुमको विपत्ति है सो कहो”। यह सुनकर

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