भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (२११)

एवमुक्त्वा चित्रग्रीवस्य पाशं छेत्तुमुद्यतं स तमाह-“भद्र मा मैवं कुरु, प्रथमं मम भृत्यानां पाशच्छेदं कुरु तदनु ममापि च”। तच्छ्रुत्वा कुपितो हिरण्यकः प्राह-‘भो ! न युक्तमुक्तं भवता यतः स्वामिनोऽनन्तरं भृत्याः”। स आह,-“भद्र ! मा मैवं वद, मदाश्रयाः सर्वे एते वराकाः, अपरं स्वकुटुम्बं परित्यज्य समागताः । तत् कथमेतावन्मात्रमपि सम्मानं न करोति । उक्तञ्च-

ऐसा कह चित्रग्रीवके पाश छेदन करनेको उद्यत हुए उससे बोला-“भद्र ! ऐसा मतकरो, पहले मेरे भृत्योंके पाश छेदन करो पीछे मेरे भी” यह सुन क्रोध कर हिरण्यक बोला-“भो ! आपने युक्त नहीं कहा कारण कि, स्वामीके अनन्तर भृत्य होते हैं”। वह बोला-“भद्र ! ऐसा मत कहो यह सब क्षुद्र मेरे वशमे हैं और यह अपना कुटुम्ब त्याग कर मेरे साथ आये हैं । सो कैसे इतनाभी इनका सन्मान न करू। कहा है-

यः सम्मानं सदा धत्ते भृत्यानां क्षितिपोऽधिकम् । वित्ताभावेऽपि तं दृष्ट्वा ते त्यजन्ति न कर्हिचित् ॥ २४ ॥

जो राजा भृत्योंका सदा अधिक सन्मान करता है वे धनके अभावमें भी उसको कभी त्यागन नहीं करते हैं ॥ २४ ॥

तथाच-
और देखो-

विश्वासः सम्पदां मूलं तेन यूथपतिर्गजः । सिंहो मृगाधिपत्येऽपि न मृगैः परिवार्यते ॥ २५ ॥

विश्वासही सम्पत्तियोंकी जड है इससेही हाथी यूथपति कहलाता है सिंह मृगाधिपति होकरभी मृगोसे परिवारित नहीं होता है ॥ २५ ॥

अपरं मम कदाचित् पाशच्छेदं कुर्वतस्ते दन्तभंगो भवति अथवा दुरात्मा लुब्धकः समाभ्येति । तत् नूनं मम नरकपात एव । उक्तञ्च-

और फिर कदाचित् मेरे पाश छेदन करनेमें तेरे दात भग होजाय अथवा यह दुरात्मा लुब्धकही आजाय तो अवश्य मेरा नरकमें पतन होगा । कहा है-