पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२२१)
बलिशेष अन्य पदार्थ प्रेमसे लाये हुए विशेष पक्कान्न हिरण्यकके वास्ते लाकर देता, हिरण्यक तन्दुल और भक्ष्यविशेष लघुपतनकके निमित्त रात्रिमें लाकर तत्काल रात्रिमें आये हुएके निमित्त अर्पण करता । अथवा दोनोंकी यह बात युक्त है । कहा है-
ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति ।
भुंक्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ॥ ५१ ॥
देता है, ग्रहण करता है, गुप्त कहता है, पूछता है, भोजन करता खवाता है यह छ. प्रकार प्रीतिका लक्षण है ॥ ५१ ॥
नोपकारं विना प्रीतिः कथंचित्कस्यचिद्भवेत् ।
उपयाचितदानेन यतो देवा अभीष्टदाः ॥ ५२ ॥
कहीं भी किसीकी प्रीति उपकारके बिना नहीं होती है उपयाचित दान (अर्थात् मेरा यह कार्य सिद्ध होगा तो यह दूंगा) से देवता भी अभीष्ट देते हैं ॥ ५२ ॥
तावत्प्रीतिर्भवेल्लोके यावद्दानं प्रदीयते ।
वत्सः क्षीरक्षयं दृष्ट्वा परित्यजति मातरम् ॥ ५३ ॥
लोकमें जबतक दान दिया जायगा तभीतक प्रीति होती है बछडा दूधका क्षय देखकर माताको त्याग देता है ॥ ५३ ॥
पश्य दानस्य माहात्म्यं सद्यः प्रत्ययकारकम् ।
यत्प्रभावादपि द्वेषी मित्रतां याति तत्क्षणात् ॥ ५४ ॥
दानका माहात्म्य तत्काल विश्वास दिलानेवालाहै देखो जिसके प्रभावसे द्वेषी उसी क्षण मित्रताको प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥
पुत्रादपि प्रियतरं खलु तेन दानं
मन्ये पशोरपि विवेकविवर्जितस्य ।
दत्ते खले तु निखिलं खलु येन दुग्धं
नित्य ददाति महिषी ससुतापि पश्य ॥ ५५ ॥
विवेकवर्जित पशुकोभी दान पुत्रसे अधिकतार प्रिय मानता हू जिससे कि, वेत्य खलके देनेपरभी सपुत्र भैंस पालकको नित्य दूध देती है ॥ ५५ ॥