पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२२५)
सोत्कण्ठः समायातः । तदागत्य आलगय माम् । उक्तञ्च-
यह सुनकर हिरण्यक उसी क्षण उसके ऊपर चढ बैठा वहभी शनैः शनैः उसको ले सम्पात उडानकी चालके क्रमसे उस सरोवरमें प्राप्त हुआ । लघुपतनकके ऊपर चूहेको अधिष्ठित देख दूरसेही देशकालका ज्ञाता वह मन्थरक कोई बडा काक है ऐसा मानकर जलमें प्रविष्ट हुआ । लघुपतनक भी तटके वृक्षकी खखोडलमें हिरण्यकको छोडकर शाखाके अग्रभागमें आरोहणकर उच्चैस्वरसे बोला—"भो मन्थरक ! आओ आओ ! तेरा मित्र मैं लघुपतनक नाम वायस हू सो आकर मुझे आलिंगनकर । कहाहै—
किं चन्दनैः सकर्पूरैस्तुहिनैः किञ्च शीतलैः ।
सर्वे ते मित्रगात्रस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ६१ ॥
चन्दन, कपूर, हिम और शीतल पदार्थसे क्या है घे सब मित्रके शरीरकी सोलहवीं कलाकी बराबर न हैं ॥ ६१ ॥
तथाच-
तैसेही-
केनामृतमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम् ।
आपदाञ्च परित्राणं शोकसन्तापभेषजम् ॥ ६२ ॥
अमृतकी समान मित्र यह दोनों अक्षर किसने बनायेहैं जो आपत्तिके रक्षक और शोक सन्ताप ( नाशक ) औषधी हैं ॥ ६२ ॥
तच्छ्रुत्वा निपुणतरं परिज्ञाय सत्वरं सलिलान्निष्क्रम्य पुलकिततनुः आनन्दाश्रुपूरितनयनो मन्थरकः प्रोवाच,— "एहि एहि मित्र ! आलिङ्गय माम्, चिरकालात् मया त्वं न सम्यक् परिज्ञातः, तेन अहं सलिलान्तः प्रविष्टः। उक्तञ्च-
यह सुन अधिकतर निपुणजान जलसे निकल पुलकायमान शरीर आनंदके आसू नेत्रमे भर मन्थरक बोला,—"आओ २ मित्र ! मुझे आलिंगनकरो चिरकालमें दर्शन होनेसे मैंने तुझको न जाना इसकारण मैं जलमें प्रविष्ट हुआ। कहा है—
यस्य न ज्ञायते वीर्य्यं न कुलं न विचेष्टितम् ।
न तेन सङ्गतिं कुर्य्यादित्युवाच बृहस्पतिः ॥ ६३ ॥"
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