पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( २३१ )
दयोऽपि तिरस्कृता अस्य उत्पतनेन" । बृहत्स्फिक् आह- "अथ ज्ञायते तस्य बिलं कस्मिंश्चित् प्रदेशे ?" ताम्रचूड आह-"भगवन् ! न वेद्मि सम्यक्" । स आह-"नूनं निधा- नस्य उपरि तस्य बिलम् । निधानोष्मणा प्रकूर्दते । उक्तञ्च-
सो मूर्ख ! गर्वको प्राप्त होनेसे तू शोचनीय है सो मै तुम्हारे मठको त्याग जाऊगा" । तब यह सुन भयसे घबडाया हुआ ताम्रचूड उससे बोला-"भो भगवन् ! ऐसा मत कहो तुम्हारा समान मेरा अन्य प्रिय सुहृत् नहीं है । परन्तु सुनो जिस कारणसे तुम्हारे वचनके मुझसे उत्तर नहीं दिये जाते । यह दुरात्मा मूषक ऊंचे स्थानमें घरे हुएभी भिक्षापात्रपर कूदकूद चढ जाता है और उसमें रक्खी हुई शेष भिक्षाको खाजाता है इस कारणसे मठमे मार्जन ( बुहारी ) भी नहीं लगती, सो मूषकके डरानेको इस वाससे बारवार भिक्षापात्रको ताडन करताहू । और कारण नहीं है । और इस दुरात्माका यह कुतूहल तो देखो जो विडाल वानर आदिभी इसने अपने कूदनेके आगे तिरस्कार कर दिये" । बृहत्स्फिक् बोला-"किस देशमें उसका बिलहै सो जानते हो ?" । ताम्रचूड बोला- "भगवन् मैं अच्छी प्रकार नहीं जानताहू" । वह बोला-"अवश्यही धनके ऊपर उसका बिल है । धनकी गरमीसे कूदता है । कहा है-
उष्मापि वित्तजो वृद्धिं तेजो नयति देहिनाम् । किं पुनस्तस्य सम्भोगस्त्यागकर्मसमन्वितः ॥ ७१ ॥
धनकी गरमी मनुष्यके तेजको बढाती है और यदि उसका भोग और त्याग हो तो क्या कहना ॥ ७१ ॥
तथाच- और देखो-
नाकस्माच्छाण्डिलीमातर्बिक्रीणाति तिलैस्तिलान् । लुञ्चितानितरैर्येन हेतुरत्र भविष्यति ॥ ७२ ॥"
हे मात ! अकस्मात् शाण्डिली ब्राह्मणी धुले तिलोसे काले नहीं बदलती है इसमें अवश्य कोई कारण होगा ॥ ७२ ॥
ताम्रचूड आह,-"कथमेतत् ?" स आह- ताम्रचूड बोला,-"यह कैसे" वह बोला-