भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (२३३)

ग्रासादपि तदर्द्धञ्च कस्मान्नो दीयतेऽर्थिषु ।
इच्छानुरूपो विभवः कदा कस्य भविष्यति ॥ ७३ ॥

अपने ग्रासमेंसे भी आधा अतिथियोंको क्यों न दिया जाय सदा इच्छाके अनुसार ऐश्वर्य किसको होसकताहै ॥ ७३ ॥

ईश्वरा भूरिदानेन यल्लभन्ते फलं किल ।
दरिद्रस्तच्च काकिण्या प्राप्नुयादिति नः श्रुतिः ॥ ७४ ॥

बडे लोग जो फल बडे बडे दानसे पातेहैं दरिद्र वह फल एक कौडीसे प्राप्त करताहै यह श्रुतिहै ॥ ७४ ॥

दाता लघुरपि सेव्यो भवति न कृपणो महानपिसमृद्ध्या ।
कूपोऽन्तःस्वादुजलः प्रीत्यै लोकस्य न समुद्रः ॥ ७५ ॥

लघु दाताभी सेवन करना चाहिये समृद्धिमान् कृपणकी सेवा न करे कूपके अन्तरका स्वादुजल मनुष्यको प्रसन्न करताहै नकि सागर ॥ ७५ ॥

तथाच–
तैसेही–

अकृतत्यागमहिम्ना मिथ्या किं राजराजशब्देन ।
गोप्तारं न निधीनां कथयन्ति महेश्वरं विबुधाः ॥ ७६ ॥

बिनाधन त्याग किये राजराज शब्दसे क्या है ? निधियोंके रक्षा करनेवाले कुबेरको पंडित जन महेश्वर नहीं कहतेहैं ॥ ७६ ॥

अपिच–
ओरभी–

सदा दानपरिक्षीणः शस्त एव करीश्वरः ।
अदानः पीनगात्रोऽपि निन्द्य एव हि गर्दभः ॥ ७७ ॥

सदा दानसे परिक्षीण एक करीश्वरही श्लाघनीय है बिना दानके पुष्ट गात्र-वाले गधेकी निन्दा होतीहै ॥ ७७ ॥

सुशीलोऽपि सुवृत्तोऽपि यात्यदानादधो घटः ।
पुनः कुब्जापि काणापि दानादुपरि कर्कटी ॥ ७८ ॥

सुवृत्त और सुशील घटभी बिनादानके नीचेको जाता है कुबडी कानी ककडी भी दानसे ऊपरही आती है ॥ ७८ ॥