पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२३५)
स्ततो निराहारतया पीडितः परिभ्रमन् तं प्रदेशमाजगाम । यावत् वराहपुलिन्दौ द्वौ अपि पश्यति तावत् प्रहृष्टो व्यचिन्तयत् । “भोः ! सानुकूलो मे विधिः । तेन एतदपि अचिन्तितं भोजनमुपस्थितम् । अथवा साधु इदमुच्यते–
किसीएक वनमें कोई पुलिन्द पापकी सम्पत्ति करनेको वनमें गया । तब जाते हुए उसने बडे अजन पर्वतके शिखरकी समान एक शूकर प्राप्त किया । उसको देख कर्णपर्यन्त खेंचे हुए सायकसे मारा तब उसने ताडित हो क्रोधित चित्तसे बालचन्द्रवत् कान्तिमान् दाढोंसे उसका पेट फाड डाला जिससे वह म्लेच्छ प्राणरहित हो पृथ्वीपर गिरा । तब लुब्धकको मारकर शूकरभी बाणप्रहारकी वेदनासे पञ्चत्वको प्राप्त हुआ, इसी अवसरमे कोई निकट मृत्युवाला शृगाल इधर उधर निराहार होनेसे पीडित हुआ, घूमता हुआ उस स्थानमें आया । जबतक शूकर और पुलिन्द दोनोंहीको देखता है तबतक प्रसन्नहो विचारनेलगा “अहो मेरे ऊपर विधाता प्रसन्न है इस कारण यह अचिन्तित भोजन प्राप्त हुआहै । अथवा यह अच्छा कहाहै–
अकृतेऽप्युद्यमे पुंसामन्यजन्मकृतं फलम् ।
शुभाशुभं समभ्येति विधिना सन्नियोजितम् ॥ ८२ ॥
विना उद्यम किये भी पुरुषोंको अन्य जन्मका किया हुआ शुभ वा अशुभ फल विधाताके नियोगसे प्राप्त होताहै ॥ ८२ ॥
तथाच–
और देखो–
यस्मिन्देशे च काले च वयसा यादृशेन च ।
कृतं शुभाशुभं कर्म तत्तथा तेन भुज्यते ॥ ८३ ॥
जिस देशकालमे जैसी अवस्थामे जिसने जैसा शुभाशुभ कर्म किया है वह वैसाही भोगताहै ॥ ८३ ॥
तदहं तथा भक्षयामि यथा बहूनि अहानि मे प्राणयात्रा भवति । तत् तावदेवं स्नायुपाशं धनुष्कोटिगतं भक्षयामि ।
उक्तञ्च–