पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२३९)
सकृदपि दृष्ट्वा पुरुषं विबुधा जानन्ति सारतां तस्य ।
हस्ततुल्यापि निपुणाः पलप्रमाणं विजानन्ति ॥ ८८ ॥
एक बारही पुरुषको देखकर पंडित उसकी सारता जानलेते हैं कुशल पुरुष हाथकी तोलसेही पलके प्रमाणको जान लेते हैं ॥ ८८ ॥
वाञ्छैव सूचयति पूर्वतरं भविष्यं
पुंसां यदन्यतनुजं त्वशुभं शुभं वा ।
विज्ञायते शिशुरजातकलापचिह्नः
प्रत्युद्गतैरपसरन्सरसः कलापी ॥ ८९ ॥
चित्तकी इच्छाही पूर्व भविष्यको सूचित करती है जो पुरुषने दूसरे शरीरमें शुभ या अशुभ किया है क्यों कि कलापका चिह्न विना निकलेभी मोरका बच्चा चालसे पहचान लिया जाता है ॥ ८९ ॥
ततोऽहं भयत्रस्तमनाः सपरिवारो दुर्गमार्गं परित्यज्य अन्यमार्गेण गन्तुं प्रवृत्तः । सपरिजनेा यावदग्रतो गच्छामि तावत् सम्मुखो बृहत्कायो मार्जारः समायाति । स च मूषकवृन्दमवलोक्य तन्मध्ये सहसा उत्पपात । अथ ते मूषका मां कुमार्गगाभिनमवलोक्य गर्हयन्तो हतशेषा रुधिरप्लावितवसुन्धराः तमेव दुर्गं प्रविष्टाः । अथवा साधु इदमुच्यते–
तब मैं भयसे व्याकुल मन हुआ परिवारसहित दुर्ग मार्गको छोडकर और मार्गमें जानेको प्रवृत्त हुआ और परिजन सहित जब आगे चला तब तो सामनेसे एक बडे शरीरवाला बिलाव आया । वह मूषकसमूहको देख एक साथ उनपर टूट पडा । तब वे मूषक मुझ कुमार्गगामीको दोष देकर निन्दा करते मरनेसे बचे रुधिरसे गीली वसुन्धराको करते उसी दुर्गमे प्रविष्ट हुए । अथवा यह सत्य कहा है–
छित्त्वा पाशमपास्य कूटरचनां भङ्क्त्वा बलाद्वागुरां
पर्यन्ताग्निशिखाकलापजटिलान्निर्गत्य दूरं वनात् ।
व्याधानां शरगोचरादपि जवेनोत्पत्य धावन्मृगः
कूपान्तः पतितः करोतु विधुरे किंवा विधौ पौरुषम् ९०॥