पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( २४५ )
हुएपर अपने दुर्गमें उसके धनको ले आऊ जिससे फिरभी मेरे धनके प्रभावसे पूर्ववत् आधिपत्य हो जायगा, कहाहै कि-
व्यथयन्ति परं चेतो मनोरथशतैर्जनाः ।
नानुष्ठानैर्धनैर्हीनाः कुलजा विधवा इव ॥ १०४ ॥
सैंकडो मनुष्य मनोरथोंसे चित्तको व्यथित करते हैं, परन्तु धनहीनोंके अनुष्ठान नहीं होतेहैं जैसे अच्छे कुलमें उत्पन्न हुई विधवा ॥ १०४ ॥
दौर्गत्यं देहिनां दुःखमपमानकरं परम् ।
येन स्वैरपि मन्यन्ते जीवन्तोऽपि मृता इव ॥ १०५ ॥
दुर्गतिही देहधारियोंका परम दुःख और परम अपमान करनेवालीहै जिसके कारण जीते हुएही उसको बन्धु मृतवत् मानते हैं ॥ १०५ ॥
दैन्यस्य पात्रतामेति पराभूतेः परं पदम् ।
विपदामाश्रयः शश्वद्दौर्गत्यकलुषीकृतः ॥ १०६ ॥
दुर्गतिसे प्राप्त हुआ मनुष्य पराभवके स्थान और विपत्तिके परम आश्रयको निरन्तर प्राप्त होताहै ॥ १०६ ॥
लज्जन्ते बान्धवास्तेन सम्बन्धं गोपयन्ति च ।
मित्राण्यमित्रतां यान्ति यस्य न स्युः कपर्दकाः ॥ १०७ ॥
उससे बान्धव लज्जित होतेहैं तथा उससे अपने सम्बन्धको छुपातेहैं बहुत क्या उसके मित्र अमित्र होजातेहैं जिसके पास कौडी नहीं होतीहै ॥ १०७ ॥
मूर्त्तं लाघवमेवैतदपायानामिदं गृहम् ।
पर्यायो मरणस्यायं निर्धनत्वं शरीरिणाम् ॥ १०८ ॥
दरिद्रकी यही मूर्ति, विपत्तियोंका यही घर है, यही मरणका दूसरा पर्यायहै, जो शरीरधारियोंको निर्धनताहै ॥ १०८ ॥
अजाधूलिरिव त्रस्तैर्मार्जनीरेणुवज्जनैः ।
दीपखद्योतछायेव त्यज्यते निर्धनो जनैः ॥ १०९ ॥
बकरीकी धूरिकी समान घबराये हुए तथा बुहारीकी धूरिकी समान दीप और पटबीजनेकी छायाकी समान दरिद्रको सब कोई त्याग देतेहैं ॥ १०९ ॥
शौचावशिष्टयाप्यस्ति किञ्चित्कार्यं क्वचिन्मृदा ।
निर्धनेन जनेनैव न तु किञ्चित्प्रयोजनम् ॥ ११० ॥